Kashi की धार्मिक और पौराणिक परंपराओं में ऐसे अनेक स्थल हैं, जिनका संबंध महाभारत काल और पांडवों के अज्ञातवास से जोड़ा जाता है। पिंडरा तहसील के रसूलपुर गांव में स्थित पांचों शिवाला मंदिर भी ऐसा ही एक प्राचीन और आस्था का प्रमुख केंद्र है। मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान पांडव काशी पहुंचे थे और पंचकोशी यात्रा के क्रम में यहां भी ठहरे थे। इसी दौरान पांचों पांडवों ने यहां भगवान शिव की आराधना की और शिवलिंग की स्थापना की थी।
रामेश्वर से करीब आधा किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह मंदिर अपने धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व के कारण श्रद्धालुओं के बीच विशेष आस्था रखता है। मंदिर परिसर (Kashi) में पंच शिवालय की स्थापत्य परंपरा दिखाई देती है, हालांकि वर्तमान में गर्भगृह के मध्य भगवान भोलेनाथ का एक प्रमुख शिवलिंग स्थापित है। इसके साथ ही यहां सूर्य नारायण देव, भगवान गणेश, माता अन्नपूर्णा और श्रीराम दरबार के विग्रह भी विराजमान हैं।
पांचों पांडवों से जुड़ी है मंदिर की मान्यता
मंदिर के पुजारी जितेंद्र मिश्रा और आचार्य रमेश तिवारी के अनुसार, इस स्थान की स्थापना पांचों पांडवों से जुड़ी हुई है। उन्होंने बताया कि उस समय यह पूरा क्षेत्र घने जंगल से घिरा हुआ था। पांडव जब रामेश्वर (Kashi) से आगे की ओर बढ़े तो तीसरे पहर के बाद इस क्षेत्र में इतना अंधेरा हो जाता था कि आगे का रास्ता दिखाई देना मुश्किल हो जाता था।
मान्यता है कि इसी स्थान पर पांडवों ने कुछ समय के लिए विश्राम किया। उन्होंने भगवान शिव की आराधना के लिए शिवलिंग स्थापित किया और पूजा-अर्चना की। पूजा के बाद उन्होंने यहां बाटी-चोखा तैयार किया, जिसे पहले भगवान शिव को अर्पित किया और फिर स्वयं प्रसाद के रूप में ग्रहण किया। इसके बाद पांडव अपने अगले गंतव्य की ओर रवाना हो गए।
स्थानीय मान्यता के अनुसार इसी घटना की स्मृति में यहां बाद में लोटा-भंटा का प्रसिद्ध मेला भी आयोजित होने लगा। आज भी यह मेला इस क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
पांच शिवालयों की परंपरा से पड़ा ‘पांचों शिवाला’ नाम
स्थानीय लोगों के अनुसार मंदिर परिसर (Kashi) का संबंध पांचों पांडवों और पांच शिवालयों की परंपरा से होने के कारण इसे ‘पांचों शिवाला’ कहा जाता है। मंदिर का गुंबद पंच शिव मंदिर की स्थापत्य परंपरा की याद दिलाता है। हालांकि वर्तमान में परिसर में एक प्रमुख शिवलिंग के साथ अन्य प्राचीन विग्रह भी संरक्षित रूप से स्थापित किए गए हैं।
मंदिर के पुजारी बताते हैं कि यहां पहले भगवान शिव के साथ अन्य प्राचीन मूर्तियां अलग-अलग स्थानों पर थीं। संरक्षण की दृष्टि से इन प्राचीन विग्रहों को एक स्थान पर व्यवस्थित कर स्थापित किया गया है। इससे मंदिर परिसर में एक साथ कई देवी-देवताओं के दर्शन की परंपरा बनी हुई है।
सूर्य नारायण से श्रीराम दरबार तक विराजमान
पांचों शिवाला मंदिर की विशेषता यह भी है कि यहां भगवान शिव के साथ अन्य देवी-देवताओं की पूजा होती है। परिसर में सूर्य नारायण देव का विग्रह, भगवान गणेश की प्रतिमा, माता अन्नपूर्णा का विग्रह और श्रीराम दरबार भी स्थापित है। श्रद्धालु भगवान शिव के दर्शन के साथ इन सभी देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना करते हैं।
मंदिर (Kashi) में सावन के महीने और महाशिवरात्रि के अवसर पर विशेष भीड़ उमड़ती है। सावन में दूर-दराज से श्रद्धालु यहां पहुंचकर भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक और पूजन करते हैं। स्थानीय लोगों के लिए यह मंदिर केवल पूजा का स्थल ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का केंद्र भी है।
Kashi: द्रौपदी कुंड को लेकर भी है पौराणिक मान्यता
मंदिर के समीप स्थित प्राचीन कुंड को भी पांडवों और माता द्रौपदी से जोड़कर देखा जाता है। स्थानीय मान्यता है कि अज्ञातवास के दौरान द्रौपदी को प्यास लगी थी। उनकी प्यास बुझाने के लिए अर्जुन ने अपने बाण से भूमि को भेदकर यहां जलधारा प्रकट की और कुंड का निर्माण हुआ। इसी कारण इसे द्रौपदी कुंड (Kashi) कहा जाता है।
वर्तमान में मंदिर के समीप स्थित इस जलाशय को अमृत सरोवर के रूप में भी विकसित किया गया है। श्रद्धालु यहां स्नान और धार्मिक अनुष्ठान करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के कारण इस सरोवर का भी मंदिर आने वाले श्रद्धालुओं के लिए विशेष महत्व है।
पांच हजार वर्ष से अधिक पुराना होने की मान्यता
स्थानीय परंपरा और मंदिर से जुड़ी मान्यताओं में पांचों शिवाला मंदिर को करीब पांच हजार वर्ष से भी अधिक पुराना बताया जाता है और इसका संबंध द्वापर युग से जोड़ा जाता है। हालांकि इतनी प्राचीनता का दावा धार्मिक और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित है। आचार्य रमेश तिवारी के अनुसार मंदिर (Kashi) का उल्लेख काशी खंड की परंपरा में भी मिलता है और पांडवों की काशी यात्रा तथा इस स्थल की स्थापना से इसका संबंध बताया जाता है।
मंदिर से जुड़ी मान्यताओं में युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव के नाम विशेष रूप से लिए जाते हैं। यही कारण है कि पांचों शिवाला मंदिर श्रद्धालुओं के बीच पांडवों की काशी यात्रा (Kashi) की स्मृति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल माना जाता है।
सावन और शिवरात्रि में उमड़ती है भीड़
सावन के पवित्र महीने में मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं के पहुंचने का सिलसिला शुरू हो जाता है। भक्त भगवान शिव का जलाभिषेक, दुग्धाभिषेक और पूजन करते हैं। महाशिवरात्रि पर भी यहां विशेष आयोजन होते हैं। मंदिर परिसर में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ आसपास के क्षेत्र में मेले जैसा वातावरण रहता है।
लोटा-भंटा मेले के दौरान इस क्षेत्र की धार्मिक गतिविधियां और भी बढ़ जाती हैं। ग्रामीण अंचल से बड़ी संख्या में लोग मंदिर और मेले में पहुंचते हैं।
आस्था, इतिहास और लोक परंपरा का संगम
रसूलपुर का पांचों शिवाला मंदिर इस मायने में खास है कि यहां महाभारतकालीन पांडवों की मान्यता, भगवान शिव की आराधना, द्रौपदी कुंड, प्राचीन विग्रह और स्थानीय लोक परंपराएं एक साथ दिखाई देती हैं। मंदिर परिसर और आसपास मौजूद प्राचीन संरचनाएं काशी के ग्रामीण धार्मिक स्थलों की समृद्ध परंपरा को सामने लाती हैं।
स्थानीय लोगों के लिए यह स्थान पांडवों की स्मृति और भगवान शिव की आराधना का केंद्र है। वहीं, श्रद्धालुओं के लिए यह काशी (Kashi) की पंचकोशी धार्मिक परंपरा से जुड़ा ऐसा पड़ाव है, जहां शिवभक्ति के साथ पौराणिक कथाओं और लोक आस्था का भी अनुभव होता है।
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राज्य संरक्षित स्मारक होने के कारण पांचों शिवाला मंदिर (Kashi) का ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्व और बढ़ जाता है। मंदिर से जुड़ी पौराणिक मान्यताएं, प्राचीन विग्रह, कुंड और सदियों से चली आ रही पूजा परंपराएं इसे काशी के महत्वपूर्ण धार्मिक स्थलों में शामिल करती हैं।





