Sunil Ojha Death: भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता व बिहार के सह प्रभारी सुनील ओझा का आज निधन हो गया। जिसके बाद बीजेपी के पूरे खेमे में शोक की लहर दौड़ पड़ी है। बीजेपी के कई नेताओं ने उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है। बताया जा रहा है कि गुरुवार को मिर्जापुर जनपद के गढ़ौली धाम आश्रम में उनका अंतिम संस्कार किया जायेगा।
गौरतलब है कि सुनील ओझा [Sunil Ojha] को मोदी का करीबी होने के साथ ही पार्टी के ‘मिस्टर भरोसेमंद’ की भी ख्याति प्राप्त थी। उन्होंने प्रधानमंत्री के लोकसभा चुनाव में भी अहम भूमिका निभाई थी। हाल ही में सुनील ओझा को उत्तर प्रदेश से बिहार में भेज कर चुनावी रणनीति तैयार करने की बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। बिहार जाने से पहले सुनील ओझा उत्तर प्रदेश के सह प्रभारी थे और उन्हें गढ़ौली धाम आश्रम में विवाद उठने के बाद बिहार में सह प्रभारी की जिम्मेदारी सौंपी गई थी।
इसी बीच सोशल मीडिया पर सुनील ओझा की एक पुरानी तस्वीर वायरल हो रही है। जिससे उनके सियासी कद का अंदाजा लगाया जा रहा है। वायरल तस्वीर 21 वर्ष पुराना बताया जा रहा है। जब वर्ष 2002 में गुजरात में विधानसभा चुनाव होने वाले थे और नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार थे। वायरल तस्वीर में नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, सुनील ओझा, ज्योतिंद्र मेहता और भीखूभाई दसलानिया विधानसभा चुनाव के दौरान चुनावी रणनीति बनाते हुए नजर आ रहे हैं।

Sunil Ojha: गुजराती होने का मिला भरपूर फायदा
दरअसल, भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता के तौर पर सुनील ओझा [Sunil Ojha] के कन्धों पर हमेशा बड़ी जिम्मेदारी देखी जाती थी। गुजरात विधानसभा चुनाव हो, या वाराणसी लोकसभा चुनाव, सुनील ओझा बीजेपी के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहे हैं। सुनील ओझा मूल रूप से गुजरात के रहने वाले थे और गुजराती होने के कारण उन्हें पीएम मोदी के सबसे करीबी नेताओं में से एक भी माना जाता था।
Highlights
कभी बीजेपी के रहे बागी, फिर मोदी की ओर झुकाव
उन्होंने [Sunil Ojha] अपने राजनीतिक कैरियर की शुरुआत गुजरात के भावनगर से की थी। वह दो बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर गुजरात के भावनगर से विधायक रहे। हालांकि 2007 में बीजेपी से टिकट न मिलने के कारण उन्होंने निर्दल चुनाव भी लड़ा था। जिसमें उन्हें अपने प्रतिद्वंदी से करारी शिकस्त भी मिली थी। इसके बाद 2011 में वे फिर से नरेंद्र मोदी के करीब आ गये और गुजरात में उन्हें बीजेपी प्रवक्ता की जिम्मेदारी सौंपी गई। वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने वाराणसी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने की तैयारी की तो सुनील ओझा, अरुण सिंह और सुनील देवधर को चुनाव जिताने की जिम्मेदारी देकर वाराणसी भेजा गया।
चुनाव के बाद सुनील देवधर और अरुण सिंह ने तो दूसरी जिम्मेदारियां संभाल ली, लेकिन सुनील ओझा को वाराणसी में ही रखा गया। सुनील ओझा को सह प्रभारी की जिम्मेदारी दी गई। सुनील ओझा को काशी क्षेत्र की जिम्मेदारी संभालते हुए 2019 में उन्हें गोरक्ष प्रांत की भी जिम्मेदारी दे दी गई। भारतीय जनता पार्टी के छह क्षेत्रों में महत्वपूर्ण होने वाले काशी क्षेत्र जिसमें एक 14 लोकसभा और 12 प्रशासनिक जिले आते हैं, उस पर सुनील ओझा ने अपना दबदबा कायम करते हुए भाजपा को मजबूत स्थिति में खड़ा करने का भी काम किया था। हालांकि गढ़ौली धाम को लेकर सुनील ओझा सबसे ज्यादा चर्चा में रहे।

