पूरे काशी (Varanasi) में विजयदशमी का पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया, जहाँ जगह-जगह रावण दहन के कार्यक्रम आयोजित किए गए। पूर्वांचल के सबसे बड़े रावण का दहन वाराणसी के डीजल रेल इंजन कारखाना (बरेका) के मैदान में हुआ, जहाँ 70 फीट ऊँचे रावण के साथ मेघनाद और कुम्भकरण के पुतलों का भी दहन किया गया। इस आयोजन को देखने के लिए हजारों श्रद्धालु पहुंचे, जिन्होंने अपने अंदर की बुराइयों का त्याग कर अच्छाई के पथ पर चलने का संकल्प लिया।
विशालकाय रावण (Varanasi) धू-धूकर जल उठा
विजयदशमी की शाम को बरेका (Varanasi) के खेल मैदान में जब प्रभु श्रीराम का तीर रावण के पुतले पर लगा, तो विशालकाय रावण धू-धूकर जल उठा। इस दृश्य के साथ ही वहां मौजूद लोग ‘जय श्रीराम’ के जयकारे लगाने लगे, जिससे पूरा वातावरण राममय हो गया।
हर साल की तरह इस वर्ष भी बरेका विजयादशमी समिति (Varanasi) द्वारा रावण दहन का भव्य आयोजन किया गया। बरेका के महाप्रबंधक एस.के. श्रीवास्तव और बरेका महिला कल्याण संगठन की अध्यक्ष गौरी श्रीवास्तव ने प्रभु श्रीराम और माता जानकी की आरती के साथ कार्यक्रम की शुरुआत की। इस अवसर पर “राम वन गमन से रावण वध” तक की रामलीला की मोनो एक्टिंग (रूपक) की प्रस्तुति की गई, जिसे दर्शकों ने खूब सराहा। इस कार्यक्रम का निर्देशन श्री एस.डी. सिंह ने किया।
भव्य आतिशबाजी और आकर्षक सजावट
इस वर्ष रावण, कुम्भकरण और मेघनाद के पुतले क्रमशः 75, 65 और 60 फीट ऊँचे थे। रावण दहन के दौरान भव्य आतिशबाजी और आकर्षक सजावट भी देखने को मिली, जिसने वहां उपस्थित अपार भीड़ को मंत्रमुग्ध कर दिया। बरेका (Varanasi) के कर्मचारियों और उनके परिजनों के साथ ही आसपास के गांवों और कस्बों से लोग बड़ी संख्या में पहुंचे। सुरक्षा के लिए जिला प्रशासन और रेल सुरक्षा बल ने पुख्ता इंतजाम किए थे।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रावण, जो चारों वेदों और 6 उपनिषदों का ज्ञाता था, अपने क्रोध और अहंकार के कारण नष्ट हो गया। जब भगवान राम ने रावण का वध किया, तो इसे बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाने लगा, जिसे विजयदशमी कहते हैं। इसी परंपरा के तहत हर साल रावण के पुतले का दहन किया जाता है, जो बुराई के अंत का प्रतीक है।


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