Varanasi: रामकुंड स्थित श्री आशुतोष हरिदास मठ में शुक्रवार को परंपरा, भक्ति और उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला। मठ की स्थापना के 100 वर्ष पूरे होने के पावन अवसर पर निकली भव्य रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा की सोने की प्रतिमाएं चांदी के भव्य रथ पर विराजमान कराई गईं। 108 श्रद्धालुओं ने मिलकर इस रथ को खींचा और पूरे परिसर में तीन परिक्रमाएं कराईं।

इस अवसर पर मठ परिसर ‘जय जगन्नाथ’ के जयघोषों से गूंज उठा। वर्षों से मठ से जुड़ी बंगीय महिलाएं और युवतियां भी रथयात्रा के आयोजन में सक्रिय रहीं। यात्रा (Varanasi) की शुरुआत विशिष्ट वैदिक मंत्रोच्चार और पद पाठ के साथ हुई, जिसके बाद छह सोपानों वाले रथ के शीर्ष पर भगवान जगन्नाथ की मूर्ति को ससम्मान स्थापित किया गया।

Varanasi: तुलसी और अन्य मालाओं से अलंकृत रहा रथ
रथ के निचले भाग में मठ के संस्थापक और उनके गुरु की प्रतिमाएं स्थापित की गईं, जिन्हें अनुयायियों ने गोद में लेकर मठ के मुख्य कक्ष से बाहर लाकर रथ पर विराजमान कराया। तुलसी और अन्य पवित्र मालाओं से अलंकृत यह रथ श्रद्धा का प्रतीक बना रहा।

आषाढ़ शुक्ल द्वितीया के पावन दिन निकली यह रथयात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि वाराणसी (Varanasi) की आध्यात्मिक विरासत का जीवंत प्रदर्शन भी थी। तीन बार मंदिर की परिक्रमा कराने के बाद भंडारे में श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद वितरित किया गया।
पुरी की विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ रथयात्रा की परंपरा से जुड़ी यह काशी की रथयात्रा भी हर वर्ष श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र होती है। चांदी के रथ, 108 हाथों से खिंचती भक्ति की डोर और जयघोषों की गूंज ने इस बार के आयोजन को और भी ऐतिहासिक बना दिया।