परंपरा, भक्ति और भावनाओं का संगम शनिवार देर रात वाराणसी (Varanasi) के रामनगर में देखने को मिला, जब हजारों श्रद्धालु विश्वविख्यात भरत मिलाप की लीला के साक्षी बने। शाम से ही रामनगर चौक और आसपास का क्षेत्र श्रद्धालुओं की भीड़ से पट गया था। लीला के समापन के बाद भी आधी रात तक श्रद्धालुओं की चहल-पहल बनी रही।

शाम ढलते ही जैसे ही भरत मिलाप (Varanasi) का समय करीब आया, रामनगर की गलियां जय श्रीराम और हर हर महादेव के नारों से गूंज उठीं। आसपास के मकानों की छतों पर भी लोगों ने पहले से जगह घेर रखी थी, ताकि इस दिव्य दृश्य का एक झलक पा सकें।
Varanasi: काशी नरेश हुए शामिल
रात्रि लगभग 11:30 बजे, परंपरा के अनुसार, रामनगर किले से सजे-धजे हाथी पर विराजमान काशी नरेश डॉ. अनंत नारायण सिंह और उनके परिवार (Varanasi) के सदस्य जैसे ही लीला स्थल की ओर निकले, तो वहां मौजूद हजारों श्रद्धालुओं ने हर महादेव के उद्घोष से स्वागत किया। डॉ. सिंह और उनके परिजनों ने भी हाथ जोड़कर लोगों का अभिवादन किया। इस दौरान रामनगर किला दीपों और झालरों से दुल्हन की तरह सजा था।

लीला के मुख्य प्रसंग में नंदीग्राम की पर्णकुटी में बैठे भरत, श्रीराम की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं। तभी ब्राह्मण वेश में पहुंचे हनुमान उन्हें श्रीराम के आगमन का संदेश देते हैं। यह समाचार सुनते ही भरत का हृदय उमंग और भक्ति से भर उठता है। वे तुरंत गुरु वशिष्ठ और माताओं को संदेश देते हैं और सभी को साथ लेकर अयोध्या की सीमा पर श्रीराम के स्वागत के लिए पहुंचते हैं।

जैसे ही भगवान श्रीराम सामने आते हैं, भरत और शत्रुघ्न उनके चरणों में गिर पड़ते हैं। महताबी रोशनी में जब चारों भाई — राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न — एक दूसरे से गले मिलते हैं, तो वातावरण में अलौकिक आभा छा जाती है। श्रद्धालु “जय श्रीराम” के उद्घोष से गगन गुंजा देते हैं। इसके बाद गुरु वशिष्ठ सुमंत को बुलाकर श्रीराम के रामराज्याभिषेक (Varanasi) की तैयारी करने का निर्देश देते हैं। सभी स्नान करके नए वस्त्र धारण करते हैं और भगवान की आरती के साथ लीला का समापन होता है।

करीब 15 मिनट तक चले इस दिव्य और भावनात्मक दृश्य को देखने के लिए हजारों लोग आधी रात तक डटे रहे। पूरा माहौल भक्ति, प्रेम और उल्लास से भरा हुआ था।
श्रद्धालुओं (Varanasi) की भारी भीड़ को देखते हुए प्रशासन ने सख्त सुरक्षा और यातायात व्यवस्था की थी। रामनगर चौक से लेकर सामनेघाट, टेंगरा मोड़, पंचवटी तिराहा और पीएसी तिराहा तक वाहनों का रूट डायवर्जन लागू किया गया था।
हर वर्ष की तरह इस बार भी रामनगर की भरत मिलाप लीला ने यह साबित किया कि भक्ति की परंपरा और लोक संस्कृति का यह उत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की आत्मा में रची-बसी जीवंत विरासत है — जो हर बार श्रद्धालुओं के दिलों में भक्ति और प्रेम का नया संचार कर जाती है।

