Chhath puja 2025: नदी के घाटों, कुंड और सरोवरों पर आज एक अलग ही रौनक है। लोक आस्था के महापर्व छठ का तीसरा दिन है, और आज की शाम डूबते सूर्य को समर्पित है। यह वह क्षण है जब व्रती महिलाएं जल में खड़ी होकर अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देती हैं, और साथ ही एक विशेष परंपरा निभाई जाती है—कोसी भरना।
कोसी: श्रद्धा की छतरी
कोसी कोई साधारण पूजा नहीं, यह एक भावनात्मक संकल्प है। इसमें गन्नों से एक (Chhath puja 2025) मंडपनुमा संरचना बनाई जाती है, जिसके केंद्र में मिट्टी का हाथी और कलश विराजते हैं। यह छतरी न केवल छठी मैया की कृपा का प्रतीक है, बल्कि परिवार की एकता और सुरक्षा का भी संकेत देती है। कोसी भरना एक महत्वपूर्ण विधान है, जो मनोकामना पूरी होने के बाद छठी मइया के प्रति आभार व्यक्त करने के लिए किया जाता है। सुख-समृद्धि और संतान की दीर्घायु के लिए कोसी भरा जाता है। कोई मन्नत पूरी हो जाती है, तो छठ पूजा के दौरान कोसी भरकर आभार, कृतज्ञता जताते हैं।
कोसी क्यों भरी जाती है?
जब किसी व्रती की मनोकामना पूरी होती है—चाहे संतान प्राप्ति हो, रोग से मुक्ति या पारिवारिक सुख—तो वह कोसी भरकर (Chhath puja 2025) छठी मैया के प्रति आभार प्रकट करता है। यह परंपरा एक तरह से धन्यवाद है, जो आस्था और कृतज्ञता के रूप में प्रकट होती है।
Chhath puja 2025 कोसी भरने की विधि: पंचतत्वों का समर्पण
– सबसे पहले एक सूप या टोकरी को सजाया जाता है।
– उसके चारों ओर 5 या 7 गन्ने खड़े कर छतरीनुमा मंडप बनाया जाता है—जो जल, पृथ्वी, अग्नि, वायु और आकाश का प्रतीक है।
– टोकरी में मिट्टी का हाथी रखा जाता है, जिस पर सिंदूर लगाया जाता है और उसके ऊपर कलश स्थापित किया जाता है।
– कलश में ठेकुआ, फल, मूली, अदरक आदि प्रसाद रखे जाते हैं।
– हाथी और कलश के ऊपर 12 दीपक जलाए जाते हैं—जो 12 महीने और चौबीसों घंटे की शुभता का प्रतीक हैं।
कोसी का सांस्कृतिक महत्व
यह परंपरा विशेष रूप से महिलाओं द्वारा निभाई जाती है, जो परिवार की सुख-शांति (Chhath puja 2025) और संतान की दीर्घायु के लिए व्रत करती हैं। कोसी का मंडप एक ऐसा भावनात्मक कवच है, जिसमें हर दीपक एक आशीर्वाद की तरह जलता है।

