Varanasi: काशी की पावन धरती पर छठ पूजा का महापर्व एक अनूठी रंगत और आध्यात्मिक उमंग के साथ संपन्न हुआ। वाराणसी के 84 घाटों पर सोमवार को डूबते सूर्य को अर्घ्य देने के लिए लाखों श्रद्धालुओं का समागम हुआ। गंगा के तटों पर आस्था और भक्ति का ऐसा संगम दिखा कि हर ओर सिर्फ छठी मइया और भगवान भास्कर की भक्ति में डूबे भक्त ही नजर आए। मंगलवार को उगते हुए सूर्य को अर्घ्य देने के साथ ही 36 घंटे का कठिन व्रत पूरा होगा।
घाटों पर आस्था का सैलाब
दोपहर से ही गंगा के घाटों पर व्रती महिलाएं और उनके परिजन पारंपरिक परिधानों में (Varanasi) सज-धजकर पहुंचने लगे। बांस के सूप और दउरी में सजे फल, पकवान और पूजन सामग्री लिए भक्तों का उत्साह देखते ही बनता था। व्रती महिलाएं घुटने या कमर तक पानी में खड़े होकर मौन भाव से सूर्यदेव की उपासना में लीन थीं, जबकि उनके साथ आईं महिलाएं छठी मइया के पारंपरिक गीत, जैसे “कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए…” गुनगुना रही थीं। पुरुष सदस्य सिर पर दउरी और पूजन सामग्री लिए उनके साथ कदम से कदम मिलाकर चल रहे थे। सूर्यास्त के समय अर्घ्य देने का दृश्य इतना मनोरम था कि गंगा तट किसी स्वर्गिक चित्र से कम नहीं लग रहा था।

सूर्य को अर्घ्य, छठी मइया की आराधना
36 घंटे के कठिन निर्जला व्रत के साथ व्रती महिलाओं ने दूध और जल से भगवान भास्कर को पहला अर्घ्य अर्पित किया। हल्की धुंध और बूंदाबांदी के बीच भी उनकी आस्था अडिग रही। सूप में सजे मौसमी फल, ठेकुआ, और अन्य शुद्ध व्यंजनों के साथ (Varanasi)व्रतियों ने परिवार की सुख-समृद्धि, संतान प्राप्ति और वंश वृद्धि की कामना की। अर्घ्य के बाद दीपक जलाकर गंगा मइया और सूर्यदेव को अर्पित किया गया। कई महिलाएं जलते दीपक के साथ घर लौटीं, जिन्हें उनके परिजन भीड़ के बीच सुरक्षित रखने के लिए घेरा बनाकर चल रहे थे।
घाटों से लेकर तालाबों तक उत्सव
दशाश्वमेध, अस्सी, पंचगंगा, सामने घाट जैसे प्रमुख घाटों पर भीड़ का मेला-सा लगा रहा। इसके अलावा वरुणा नदी, सूर्य सरोवर, लक्ष्मीकुंड, पिशाचमोचन तालाब और अस्थायी जलाशयों पर भी भक्तों का तांता लगा रहा। इन स्थानों को रंग-बिरंगे फूलों और (Varanasi) आकर्षक सजावट से संवारा गया था। सामाजिक संगठनों ने गंगा तट और सूर्य सरोवर के पास सहायता शिविर लगाए, जहां भक्तों को सुविधाएं प्रदान की गईं।

रात्रि जागरण और मंगलवार का पारण
अर्घ्य के बाद हजारों व्रती महिलाएं (Varanasi) गंगा तट पर ही रुक गईं। पूरी रात खुले आसमान के नीचे भजन-कीर्तन और छठी मइया की महिमा के गीतों के बीच जागरण हुआ। मंगलवार की सुबह उदयाचलगामी सूर्य को अंतिम अर्घ्य देकर व्रत का पारण होगा, जिसके साथ यह चार दिवसीय पर्व सम्पन्न होगा।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
जिला प्रशासन और पुलिस ने भक्तों की सुरक्षा के लिए पुख्ता व्यवस्था की थी। एनडीआरएफ और जल पुलिस की टीमें गंगा में नावों के जरिए निगरानी करती रहीं। महिला पुलिसकर्मी और अन्य सुरक्षा बल भीड़ को नियंत्रित करने और (Varanasi)श्रद्धालुओं की सुरक्षा में मुस्तैद रहे। सीसीटीवी और ड्रोन कैमरों से भी घाटों पर कड़ी नजर रखी गई।

काशी की अनूठी आध्यात्मिक छटा
काशी (Varanasi) में छठ पूजा का यह उत्सव न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक वैभव का भी जीवंत उदाहरण है। गंगा के घाटों पर उमड़ी भीड़, पारंपरिक गीतों की मधुर ध्वनियां और सूर्योपासना की भक्ति ने काशी को एक बार फिर आध्यात्मिक उल्लास से सराबोर कर दिया। यह पर्व काशीवासियों के लिए न केवल धार्मिक, बल्कि सामुदायिक एकता और प्रेम का उत्सव भी है।

