- दुधारु पशुओं के राशन के दाम में 75 फीसदी तक हो गयी बढ़ोतरी, पशुपालक हलकान
- चारे की कीमत में तीन गुना इजाफा, 400 से बढ़कर 1200 रुपये प्रति कुं. हो गया भूसा
- चोकर 30 रुपये, मसूर 28 रुपये, चना चूनी 32 रुपये और तीसी खली 80 रुपये किलो
रामदुलार यादव
वाराणसी। दूध ही धरती का अमृत है। बच्चों और बुजुर्गों को हर हाल में दूध चाहिए। युवाओं को संपूर्ण पोषण के लिए दूध आवश्यक है। सुबह दूध के बगैर चाय की चुस्की पूरी नहीं हो सकती। मिठाई बनाने के लिए दूध चाहिए। दूध की आवश्यकता हर किसी के लिए जरूरी है। सो, दूध और उससे बनने वाले प्रोडक्ट्स की मांग लगातार बढ़ रही है। लेकिन दुधारु पशुओं को खिलाए जाने वाला चारा और राशन महंगाई की चपेट में है। पशुओं के चारे व राशन के दाम आसमान छू रहे हैं। इस कारण दूध के रेट में भी आग लगी हुयी है।
महंगाई की यह आग पशुओं के दूध को जला रही है। जिन गाय-भैंसों से प्रतिदिन आठ से दस लीटर दूध मिल रहा था वह अब मात्र 5-6 लीटर दूध दे रही हैं। इसका कारण बताया जा रहा है कि पशुओं को पर्याप्त भोजन न मिलने के कारण यह स्थिति है। फलस्वरूप पशुपालक ही खामियाजा भुगत रहे हैं। गेहूं के भूसे के रेट में चार गुना बढ़ोतरी हुयी है। पहले यह 400 रुपये प्रति कुं. ऊबक रहा था और अब 11 सौ से लेकर 12 सौ रुपये प्रति कुं. हो चुका है। इसी प्रकार बीते साल पुआल 4-5 रुपये प्रति अटिया था जो वर्तमान में आठ रुपये से लेकर 12 रुपये प्रति अटिया बिक रहा है। पर्याप्त खली चूनी न मिलने से पशुओं की सेहत प्रभावित होने से उनके दूध देने की क्षमता घट रही है।
पशुओं को दाना के रूप में खिलाया जाने वाला राशन भी महंगा हो चुका है। सो, अधिकांश पशुपालक चोकर और मसूर ही खिला पाते हैं। चना की चूनी, खेसारी, तीसी आदि भोजन सब पशुपालकों के बस का नहीं रह गया है। 18 से 20 रुपये प्रति किलो बिकने वाले चोकर का दाम बढ़कर 34 रुपये प्रति किलो हो गया था जो फिलहाल 30 रुपये प्रति किलो की दर से बिक रहा है। 16 रुपये से लेकर 18 रुपये प्रति किलो बिकने वाला मसूर 28 रुपये किलो के भाव बाजार में है। सरसों की खली 25 रुपये, तीसी की खली 80 रुपये प्रति किलो बिक रहा है।
महंगाई के कारण बेच दी भैंस
हरहुआ ब्लॉक के आयर ग्राम पंचायत निवासी पशुपालक रामबालक यादव ने कहा कि वर्तमान में दुधारू पशुओं को पालना कठिन कार्य हो गया है। महंगाई की वजह से पशुओं के खान-पान का बजट डांवाडोल हो चुका है। पहले चारा इतना महंगा नहीं था। इसलिए बाध्य होकर हमने एक भैंस बेच दी। वहीं, ग्रामीण कृष्ण कुमार मिश्र कहते हैं कि यदि शौक हो तो गाय-भैंस रखिए वरना उससे कोई लाभ नहीं है। सिर्फ शुद्ध दूध बच्चों को मिल जाय यही सबसे बड़ी आमदनी है। कुरौली निवासी दुर्गा चौबे ने बताया कि पशुपालन करना मेरी बाध्यता है। कारण, खेती-बाड़ी है तो पशु भी रखना आवश्यक है अन्यथा खेत से मिलने वाला भूसे का कोई खरीदार नहीं मिलेगा। खली चूनी वाले दुकानदार की उधारी चुकना मुश्किल हो रहा है।
अनुदान की व्यवस्था करे सरकार
भारतीय पशुपालक संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष विजय बहादुर यादव ने बताया कि सरकार हर क्षेत्रों में सब्सिडी दे रही है लेकिन सबसे जरूरी अमृत रूपी दूध उत्पादक पशुपालकों इस दिशा में अनुदान की व्यवस्था नहीं है। पशु बीमार हों तो वह नुकसान पशुपालक को ही उठाना पड़ता है। तमाम पशुपालक इस व्यवस्या से दूर हो रहे हैं। पशुओं की देखभाल और उनके लालन-पालन में दिनभर पूरा परिवार लगा रहता है। इस जिम्मेदारी से एक दिन भी छुट्टी नहीं मिलती। पशुपालक भले ही अस्वस्थ हो लेकिन उसे अपने पशुओं की सेवा प्रतिदिन करनी पड़ती है।
बने ठोस योजना
इस बारे में कई पशुपालकों की राय है कि पशुपालकों का जीवन स्तर को ऊंचा उठाने के लिए सरकार को ठोस योजना बनानी चाहिए। ग्रामीण नंदा यादव कहते हैं कि पशुपालन अब मुनाफे का सौदा नहीं रह गया है।