Varanasi: इस वर्ष 27 फरवरी को श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में पारंपरिक रंगभरी एकादशी महोत्सव मनाया जाएगा। रंगभरी एकादशी को भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन के प्रतीक उत्सव के रूप में मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार बाबा की रजत प्रतिमा को महंत आवास से पालकी यात्रा के साथ मंदिर प्रांगण लाया जाता है। वैदिक मंत्रोच्चार के बीच प्रतिमा को गर्भगृह (Varanasi) में सिंहासन पर विराजमान कराया जाता है और विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इसके बाद भक्तों को झांकी दर्शन कराए जाते हैं और रंग-गुलाल के साथ उत्सव का शुभारंभ होता है।
इसी बीच महोत्सव से पूर्व प्रतिमा को लेकर विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। पूर्व महंत पं. लोकपति तिवारी ने दावा किया है कि प्राचीन रजत प्रतिमा उनके बड़ादेव स्थित आवास पर विराजित है और उसकी नियमित पूजा-अर्चना उनके द्वारा की जाती है।
Varanasi: मंदिर में नही जाती असली प्रतिमा
पं. लोकपति तिवारी ने कहा, “पिछले लगभग पांच वर्षों से मंदिर प्रशासन (Varanasi) द्वारा प्राचीन रजत प्रतिमा को मंदिर में नहीं लाया जा रहा है और कथित रूप से दूसरी प्रतिमा से परंपरा का निर्वहन कराया जा रहा है। मैंने कई बार जिला प्रशासन और मंदिर प्रशासन से इस विषय में निवेदन किया, लेकिन अब तक कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला।”
उन्होंने आगे कहा कि जब भी प्रमुख परंपराओं का समय आता है, तो मेरे आवास (Varanasi) के बाहर भारी पुलिस बल तैनात कर दिया जाता है। मेरा निवेदन है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कराई जाए, ताकि बाबा विश्वनाथ की प्राचीन परंपरा को न्याय मिल सके। पूर्व महंत ने यह भी आरोप लगाया कि प्रकरण को आपसी विवाद बताकर टाल दिया जाता है, जबकि वास्तविक स्थिति की जांच अब तक नहीं कराई गई है। उन्होंने प्रशासन से इस मामले पर जांच की मांग की है।
फिलहाल रंगभरी एकादशी की तैयारियां अपने अंतिम चरण में हैं। श्रद्धालुओं (Varanasi) में उत्साह का माहौल है और काशी में पारंपरिक रूप से इस पर्व को लेकर विशेष रौनक देखी जा रही है। अब सभी की निगाहें इस बात पर हैं कि इस वर्ष परंपरा का निर्वहन किस प्रकार किया जाएगा।

