भगवान परशुराम का जन्म भगवान विष्णु के दस पूर्ण अवतारों में से छठे अवतार के रूप में हुआ था। इस अवतार का मुख्य उद्देश्य पृथ्वी से पाप का अंत करना, भगवान विष्णु के भविष्य के अवतारों के समय अपनी निर्धारित भूमिका को निभाना तथा अंतिम विष्णु अवतार कल्कि को शिक्षा प्रदान करना है। भगवान परशुराम की भूमिका को देखते हुए उनका जीवनकाल कलियुग के अंत तक निर्धारित है। आज हम भगवान परशुराम के संपूर्ण जीवनकाल तथा उसमे घटित प्रमुख घटनाओं का वर्णन करेंगे।
भगवान परशुराम का जीवन परिचय
भगवान परशुराम का जन्म
भगवान परशुराम का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। उनके पिता ब्राह्मण जमदग्नि तथा माता क्षत्रिय रेणुका थी। इसलिये उनके अंदर ब्राह्मण तथा क्षत्रिय दोनों के गुण थे। उनका बचपन में नाम राम रखा गया था किंतु भगवान शिव से प्राप्त अस्त्र परशु या कुल्हाड़ी के कारण उन्हें परशुराम के नाम से जाना जाने लगा। वर्तमान में उनका जन्मस्थल मध्य प्रदेश राज्य के इंदौर में जनापाव नामक पहाड़ियां है।
परशुराम ने किया अपनी माँ का वध
एक बार परशुराम की माता रेणुका स्नान करने नदी पर गयी हुई थी। वहां उनका मन एक राजा पर आ गया। जब उनके पिता जमदग्नि को यह बात पता चली तो उन्होंने परशुराम को अपनी माँ का मस्तक काटने का आदेश दिया। पिता की आज्ञा पाकर परशुराम ने अपनी माँ का सिर धड़ से अलग कर दिया। इससे प्रसन्न होकर उनके पिता ने उनसे वर मांगने को कहा। अपने वर में परशुराम ने पुनः अपनी माता को जीवित करने को कहा। इस प्रकार उनकी माता पुनः जीवित हो उठी थी।
भगवान परशुराम ने किया 21 बार क्षत्रियों का संहार
यह एक मिथ्या बात हैं कि भगवान परशुराम ने संपूर्ण पृथ्वी से पूर्णतया 21 बार क्षत्रियों का संहार कर दिया था अर्थात पृथ्वी को क्षत्रिय जाति रहित कर दिया था। दरअसल उन्होंने क्षत्रिय जाति के हैहय वंश का इस पृथ्वी से 21 बार संहार किया था क्योंकि उन्होंने उनके पिता का वध किया था।
रामायण में परशुराम
कुछ समय पश्चात अयोध्या में भगवान विष्णु ने अपना सातवाँ अवतार श्रीराम के रूप में लिया। जब श्रीराम अपने गुरु विश्वामित्र के साथ माता सीता के स्वयंवर में आये थे तब उन्होंने शिव धनुष को तोड़ डाला था। शिव धनुष के टूटने की गर्जना तीनों लोकों में फैल गयी थी तथा महेंद्रगिरी पर्वत पर तपस्या कर रहे परशुराम को भी यह सुनी थी।
उसके पश्चात वे क्रोध में राजा जनक की नगरी पहुंचे तथा शिव धनुष तोड़ने वाले का नाम पूछा। तब उनकी श्रीराम के छोटे भाई तथा शेषनाग के अवतार लक्ष्मण से तीखी बहस हुई लेकिन जब उन्हें यह ज्ञान हुआ कि श्रीराम स्वयं भगवान विष्णु का सातवाँ रूप हैं तो वे वहां से चले गए।
महाभारत में परशुराम
श्रीराम के पश्चात भगवान विष्णु ने द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में आठवां अवतार लिया। उस समय श्रीकृष्ण का मुख्य उद्देश्य महाभारत के युद्ध का नेतृत्व करना था। उस युद्ध के कई महान योद्धाओ को भगवान परशुराम ने ही शिक्षा दी थी। भगवान परशुराम के द्वारा भीष्म पितामह, गुरु द्रोणाचार्य तथा कर्ण को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी गयी थी।
एक बार उनका अपने ही शिष्य भीष्म पितामह से भयंकर युद्ध हुआ था। यह युद्ध भगवान परशुराम ने काशी की राजकुमारी अंबा को न्याय दिलवाने के लिए लड़ा था। चूँकि भीष्म को अपनी इच्छा के अनुसार मृत्यु का वरदान था, इसलिये इस युद्ध में कोई परास्त नही हुआ था। अंत में देवताओं व इंद्र के द्वारा यह युद्ध रुकवा दिया गया था।
महाभारत के एक और महान योद्धा कर्ण ने भगवान परशुराम से झूठ बोलकर शिक्षा ग्रहण की थी। कर्ण के इस असत्य से भगवान परशुराम इतने ज्यादा क्रोधित हो गए थे कि उन्होंने उसे श्राप दिया था कि जब भी उसे अपनी इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी उस समय वह उसको पूर्णतया भूल जायेगा।
परशुराम का कोंकण बसाना
कहते हैं कि एक समय भारत के पश्चिमी तट की भूमि जलमग्न थी। तब भगवान परशुराम ने अपनी कुल्हाड़ी से समुंद्र के पानी पर प्रहार किया तथा उसे पीछे धकेल दिया। इससे वहां भूमि का निर्माण हुआ जिसे कोंकण की भूमि कहा गया। इसमें वर्तमान का गोवा और केरल, महाराष्ट्र तथा गुजरात के कुछ भूभाग सम्मिलित है। गोवा के निर्माण में भगवान परशुराम की अतिमहत्वपूर्ण भूमिका थी। इसलिये आज भी गोवा के निर्माता के रूप भगवान परशुराम को धन्यवाद किया जाता है।
भगवान परशुराम व भगवान कल्कि अवतार
ऐसा बताया गया हैं कि भगवान परशुराम चिरंजीवी हैं तथा उनका अंत कलियुग की समाप्ति के साथ ही होगा। यह वह समय होगा जब भगवान विष्णु अपना अंतिम तथा दसवां कल्कि अवतार लेने इस पृथ्वी पर आयेंगे। तब उन्हें अस्त्र-शस्त्र की विद्या देने का भार भगवान परशुराम पर ही होगा। एक तरह से भगवान परशुराम भगवान कल्कि के लिए गुरु की भूमिका निभाएंगे, तब जाकर इस मृत्यु लोक पर उनका कर्तव्य पूर्ण माना जायेगा।
भगवान परशुराम की मृत्यु
जैसा कि हमनें आपको ऊपर ही बताया कि भगवान परशुराम का कर्तव्य अभी भी पूर्ण नही हुआ हैं। वे भगवान विष्णु के छठे अवतार थे जबकि इस कल्प में भगवान विष्णु को कुल दस अवतार लेने हैं। भगवान परशुराम का कर्तव्य केवल अपने समय काल तक का ही नही था अपितु उनकी भूमिका भगवान विष्णु के सातवें अवतार (श्रीराम के समय) और आठवें अवतार (श्रीकृष्ण के समय) भी रही हैं।
इसी के साथ उनकी मुख्य भूमिका भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि भगवान को शिक्षा देने और अस्त्र-शस्त्र चलाने की विद्या देने की होगी। भगवान कल्कि को संपूर्ण ज्ञान देने के बाद भगवान परशुराम का कर्तव्य पूर्ण हो जाएगा और वे इस मृत्यु लोक को छोड़कर श्रीहरि में समा जाएंगे।
Anupama Dubey