Varanasi: काशी जहाँ बसे हैं स्वयं बाबा मसाननाथ और होली से पहले व रंगभरी एकादशी के दसूरे दिन यानि द्वादशी तिथि पर इसी महादेव की नगरी में मनाई जाती है मसाने की होली। लेकिन इन दिनों काशी के मसाने की होली को लेकर एक नया विवाद गहराता जा रहा है। मणिकर्णिका घाट पर खेली जाने वाली चिता भस्म की होली, जिसे “मसान की होली” कहा जाता है, अब विद्वानों के निशाने पर है।

एक तरफ जहाँ काशी विद्वत परिषद ने इसे परंपरा और मर्यादा के विरुद्ध बताते हुए रोक लगाने की मांग उठाई है। उनका कहना है कि यह होली श्मशान की मर्यादा को भंग करता है। वहीं दूसरी तरफ आयोजक गुलशन कपूर ने साफ़ तौर पर इसका खंडन किया है और कहा है कि ये सब काशी (Varanasi) को सिर्फ बदनाम करने की साजिश है। ये सिर्फ नजरिये की बात है, जैसा लोग इसे देखेंगे वैसा उन्हें दिखलाई देगा। मसान की होली पर उठे विवाद ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि परंपरा और आधुनिकता के नाम पर फूहड़ता के बीच सीमा कहाँ खींची जाए।

काशी विद्वत परिषद ने रोक की उठाई मांग
काशी विद्वत परिषद (Varanasi) के प्रोफेसर विनय पांडेय ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि मसाने की होली शास्त्रसम्मत नहीं है। उनके अनुसार, यह आयोजन सनातन परंपरा के स्वरूप को विकृत करता है और श्मशान की मर्यादा को भंग करता है। उन्होंने कहा कि श्मशान उत्सव का स्थल नहीं है, बल्कि यह वह स्थान है जहाँ मनुष्य जीवन की अंतिम यात्रा पूरी करता है।

प्रोफेसर पांडेय ने सवाल उठाया कि जब लोग श्मशान जाते हैं तो किस भाव से जाते हैं? वहाँ का वातावरण गंभीर और पवित्र होता है। ऐसे स्थल पर नृत्य, तांडव और हुड़दंग करना शास्त्रों के अनुरूप नहीं है। उन्होंने कहा कि भगवान शिव (Varanasi) का तांडव दिव्य है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर व्यक्ति श्मशान में जाकर शिव का रूप धारण कर ले।
आयोजक गुलशन कपूर ने किया खंडन
वहीं जब इसके बारे में वाराणसी (Varanasi) के महाशमशाननाथ मंदिर के गुलशन कपूर से पूछा गया, तो उन्होंने इसका कड़े शब्दों में खंडन किया और तर्क देते हुए कहा कि जब रंगभरी एकादशी पर महादेव माता पार्वती का गौना कराकर अपने साथ ले जाते हैं तब तो पूरी दुनिया होली खेलती है लेकिन उसके दूसरे दिन द्वादशी तिथि पर बाबा के गण जिसमें भुत-पिशाच आदि शामिल है, वह चिता के राख से होली खेलते हैं। इसका वर्णन पुराणों में भी मिलता है।

हालांकि विगत 10-15 सालों से सोशल मीडिया के माध्यम से यह बेहद प्रसिद्ध हो गई ऐसे में कुछ घृणित मानसिकता के लोग हैं। जिन्हें इससे दिक्कत होने लगी। उन्हें यह लगने लगा कि काशी की यह परंपरा नई है जबकि यह सालों से चला आ रहा है।
उन्होंने आगे कहा कि ऐसे लोग कहां से आते हैं, वो ही जाने। ये सिर्फ लोगों के नजरिएँ की बात है। जैसे नजरियें से लोग इसे देखते हैं वैसा उन्हें दिखलाई देता है। काशी का दूसरा नाम महा शमशान है और यहाँ पर काशी (Varanasi) के अधोर पन्त को बदनाम करने की साजिश रची जा रही है।

अपने तर्क में उन्होंने आगे यह कहा कि काशी (Varanasi) के हर गली, चौक-चौराहे पर होलिका माता को सजाया जाता है। होलिका क्या है, वह होलिका माता की चिता है, जिसके जलने के बाद उसके भस्म को माथे पर लगाने के बाद ही रंगोत्सव की शुरुआत होती है। इसीलिए ये कहना गलत है कि शास्त्र सहमत नहीं है। ये सब उनके मन की रची हुई कहानी है। ये लोग चंदाजीवी लोग है। इनका प्रयास है कि ये आयोप्जन में आकर चन्दा एकत्रित करें लेकिन ऐसे लोगों को आयोजन में घुसने नहीं दिया गे इसी,इए ये लोग इस प्रकार से अब काशी की परंपरा को बदनाम करने के काम कर रहे हैं।
मसान की होली (Varanasi) को लेकर उठा विवाद केवल एक आयोजन का नहीं, बल्कि परंपरा और मर्यादा के बीच संतुलन का प्रश्न है। एक ओर इसे काशी की प्राचीन आस्था और लोकपरंपरा से जुड़ा उत्सव बताया जा रहा है, तो दूसरी ओर विद्वत वर्ग श्मशान की गरिमा और शास्त्रीय मर्यादा की बात कर रहा है। स्पष्ट है कि काशी की पहचान उसकी आध्यात्मिक गंभीरता और सांस्कृतिक विरासत से है, इसलिए आवश्यक है कि संवाद और विवेक के साथ ऐसा रास्ता निकाला जाए जिसमें परंपरा भी सुरक्षित रहे और मर्यादा भी अक्षुण्ण।

