Ravan Dahan: सांस्कृतिक नगरी काशी में दशहरे की तैयारियां जोरों पर हैं। इस बार 2 अक्टूबर को गंगा-वरुणा संगम के तट पर लाटभैरव रामलीला समिति द्वारा आयोजित रावण दहन न केवल भव्य होगा, बल्कि पर्यावरण के प्रति संवेदनशील भी। 51 फीट ऊंचे रावण के साथ 45-45 फीट के कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले इको-फ्रेंडली सामग्री से तैयार किए गए हैं, जो पर्यावरण संरक्षण का संदेश दे रहे हैं।

लाटभैरव रामलीला समिति ने इस बार प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया है। आयोजन स्थल पर अतिथियों को मिट्टी की बोतलों में पानी और आम लोगों के लिए रंगीन मटकों की व्यवस्था की गई है। पुतलों में एक-एक हजार इको-फ्रेंडली बमों का उपयोग किया गया है, जो ध्वनि और वायु प्रदूषण को कम करते हुए रंग-बिरंगी रोशनी बिखेरेंगे। रावण (Ravan Dahan) के पुतले से आंखों और मुंह से चिंगारियां निकलेंगी, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देंगी। समिति के प्रधानमंत्री एडवोकेट कन्हैयालाल यादव ने बताया, “हमारा लक्ष्य भव्यता के साथ पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देना है।”
Ravan Dahan: चार पीढ़ियों की आस्था और कला
रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के इन पुतलों को बनाने में अंबियाँमंडी के एक मुस्लिम परिवार की चार पीढ़ियों की मेहनत शामिल है। इश्तियाक और उनका परिवार दशकों से न सिर्फ लाटभैरव, बल्कि काशी और पूर्वांचल की अन्य रामलीलाओं के लिए भी पुतले तैयार करता आ रहा है। इश्तियाक कहते हैं, “रावण (Ravan Dahan) सिर्फ खलनायक नहीं, बल्कि ज्ञानी और बलशाली थे। हम इन पुतलों को पूजा की तरह बनाते हैं।” दशहरे के दिन वे पुतलों की विधिवत पूजा करते हैं, लेकिन रावण दहन से पहले वहां से चले जाते हैं, क्योंकि उनकी मेहनत का प्रतीक आग में भस्म हो जाता है, जो उन्हें भावुक कर देता है।
यह आयोजन (Ravan Dahan) न केवल धार्मिक उत्साह का प्रतीक है, बल्कि हिंदू-मुस्लिम एकता का भी जीवंत उदाहरण है। इश्तियाक के परिवार की यह कला और आस्था काशी की गंगा-जमुनी तहजीब को और मजबूत करती है। दशहरे का यह पर्व पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक एकता का अनूठा संगम बनने जा रहा है।

