Kalki Temple: पौराणिक नगरी संभल का इतिहास काफी प्राचीन है। कभी यहां भगवान श्री कृष्ण ने देवी रुक्मिणी संग विश्राम किया, तो यहीं कल्कि अवतार लेकर वापस आने का वचन भी दे दिया। उसके बाद भगवान ने यहां महादेव की आराधना कर गोपलेश्वर महादेव की स्थापना की।
उत्तर प्रदेश का संभल जिला अत्यंत पौराणिक माना जाता है। यहां स्थित श्रीवंश गोपाल कल्कि धाम 68 तीर्थ 19 कूपों में शामिल है। मान्यता है कि लगभग 5 हजर वाढ पूर्व जब भगवान कृष्ण ने देवी रुक्मिणी का हरण किया, तब वह यहीं पर रुके थे। उन्होंने यहां जंगल में कदंब के वृक्ष ने नीचे विश्राम किया था। यहां उन्होंने देवी रुक्मिणी को कलयुग में भगवान श्रीकल्कि के रूप में अवतार लेकर संभल में आने की बात बताई। तत्पश्चात उन्होंने यहां ब्रह्मा जी को बुलवाकर गोपलेश्वर महादेव मंदिर बनवाया।

उत्तर प्रदेश का संभल जनपद धार्मिक और ऐतिहासिक दृष्टिकोण से काफी मह्त्वपूर्ण माना जाता है, ऐसा इसलिए क्योंकि यहां पर भगवान श्रीकल्कि का अवतार होना है। इसके चलते यहां की महत्ता और भी बढ़ जाती है। लेकिन, क्या आपको पता है कि पौराणिक नगरी के नाम से विख्यात संभल में एक कदंब का ऐसा वृक्ष भी है, जिसकी परिक्रमा करने से न सिर्फ मुरादें पूरी होती हैं, बल्कि संतान की प्राप्ति भी होती है।

Kalki Temple: श्री वंश गोपाल तीर्थ नाम से जाना जाता है मंदिर
संभल तहसील क्षेत्र के गांव बेनीपुर चक गांव में श्रीवंश गोपाल तीर्थ धाम है यहां पर कदंब का वृक्ष स्थित है, कहा जाता कि यह कदंब का वृक्ष करीब 5000 वर्ष पुराना है। द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण कुंदनपुर से रुकमणी का हरण करके यहां लाए थे और इसी वृक्ष के नीचे रात्रि विश्राम किया था तभी से कहा जाता है कि इस वृक्ष की परिक्रमा करने से जो भी श्रद्धालु संकल्प लेते हैं तो उनकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। साथ ही इस वृक्ष की परिक्रमा करने से ‘वंश’ की वृद्धि होती है, जिस कारण इस स्थान को श्री वंश गोपाल तीर्थ के नाम से जाना जाता है।

मंदिर के महंत भगवत प्रिय ने बताया कि भाईदूज के दूसरे दिन यहां फेरी परिक्रमा का आयोजन होता है, जिसमें देशभर से श्रद्धालु पूजा-अर्चना करने आते हैं और हजारों-लाखों की संख्या में श्रद्धालु 24 कोसी परिक्रमा लगाते हैं, परिक्रमा यही तीर से शुरू होती है और इसी तीर्थ पर आकर संपन्न होती है।
श्रीवंश गोपाल कल्कि धाम मंदिर महंत ने बताया कि जब भगवान श्रीकृष्ण रुक्मणी का हरण करके आए तो वह एक रात के लिए इसी वृक्ष के नीचे रुके थे। यहां कल्पतरु वृक्ष है जो 5,241 वर्ष पुराना है।