- राधेश्याम कमल
मेरे हाथों की लकीरों के इजाफे हैं गवाह, मैंने पत्थर की तरह खुद को तराशा है बहुत। यह कहना है बनारस की संस्कृतिकर्मी, नाटककार, लेखिका व उद्घोषिका प्रतिमा सिन्हा का। कोई भी प्रतिमा वैसे भी पूजनीय मानी जाती है। इसलिए नहीं कि उसमें देवता का वास होता है। प्रतिमा जब गढ़ी जाती है तो उसमें छेनी-हथौड़ी लगती है लेकिन बाद में वह प्रतिमा बन जाती है।
कुछ यही कहानी है वाराणसी के प्रतिमा सिन्हा (Pratima Sinha) की। प्रतिमा सिन्हा का मानना है कि मैं एक सेल्फ मेड इंसान हूं। मैंने सम्मान के साथ जीवन जिया। काशी जो विद्वानों की नगरी मानी जाती है अगर ऐसी जगह पर कोई मुझे सम्मान देता है तो यह हमारे लिए बहुत बड़ी बात है। प्रतिमा सिन्हा कभी भी भीड़ के पीछे नहीं गईं। किसी भी कार्यक्रम के लिए कभी किसी की सिफारिश तक नहीं की। प्रतिमा सिन्हा में एक नहीं कई प्रतिभाएं हैं। स्टेज पर कभी संस्कृतिकर्मी, कभी नाटककार, लेखिका व कभी बतौर उद्घोषिका की भूमिका में बनारस के लोगों ने उन्हें देखा और उनकी कार्य कुशलता की प्रशंसा ही की।

वसंत कालेज राजघाट से स्नातक, महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से डबल एमए व पत्रकारिता की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने (Pratima Sinha) एक वर्ष तक प्रख्यात शास्त्रीय गायिका पद्मविभूषण स्व. गिरिजा देवी अप्पाजी के सानिध्य में रह कर शास्त्रीय गायन की बारीकियों को भी सीखा। जो बाद में उन्हें विश्व विख्यात संकटमोचन संगीत समारोह में काम आया।

प्रतिमा सिन्हा (Pratima Sinha) एक मध्यम वर्गीय परिवार की हैं। न कोई तामझाम न ही दिखावा, बस मन में एक उद्देश्य किसी भी समारोह में सभी को बरबस अपनी ओर आकृष्ट करना रहा। लगभग दो दशकों तक प्रतिमा सिन्हा ने अनगिनत समारोहों में अपनी मौजूदगी का लोगों को अहसास कराया। अपनी लगन, परिश्रम की बदौलत प्रतिमा सिन्हा काशी से मुंबई पहुंच गई हैं। ऐसा नहीं कि बनारस से उनका नाता टूट गया है।
उनका संपर्क आज भी बनारस से बना हुआ है। उनका कहना है कि बनारस किसी से कभी छूटता नहीं है। बनारस से मुबई तक का सफर मेरा एक सपना था जिसे पूरा करने में मुझे बीस साल लग गये। प्रतिमा सिन्हा (Pratima Sinha) एक समारोह के सिलसिले में बनारस आयी थीं। इस दौरान उनसे खास मुलाकात की गई।
प्रेमचंद की 10 कहानियों व निर्मला का किया नाट्य रूपांतर, एक कहानी संग्रह की है योजना
प्रतिमा सिन्हा (Pratima Sinha) बताती हैं कि उन्होंने उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की दस कहानियों और निर्मला उपन्यास का नाट्य रुपांतर किया है। वे कहती हैं कि मैं अंदर से एक लेखिका ही हूं। इसके अलावा 12 कहानियां भी लिखी। इन कहानियों का एक संग्रह करने की मेरी योजना है। वे कहती है कि मुझे बहुत गर्व है कि हमने जो कुछ भी किया अपने बलबूते पर किया।
सिनेमा एक ऐसा माध्यम है जिसके जरिये आपकी कहानी को पूरी दुनिया देख सकती है। मेरा सौभाग्य है कि मैं दो बड़े बैनर की फिल्मों में बतौर लेखिका के रूप में जुड़ी हूं। वे एक अर्न्तमुखी महिला हैं। उन्होंने कभी किसी कोई समझौता नहीं किया। कहा कि मुंबई आकर हमने बहुत बड़ा रिस्क लिया है लेकिन मुझे इसका जरा भी अफसोस नहीं है। बनारस ने मुझे काफी काबिल बना दिया है।

वे (Pratima Sinha) बताती है कि बनारस में स्वरांगना ललित कला केन्द्र व सेतु के कार्यक्रमों में वे 2001 से लगी रही। 2002 में भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां व 2014 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कार्यक्रमों में उद्घोषिका के रूप में मुझे गर्व ही होता है।
highlights
Pratima Sinha ने 15 नाटक भी लिखे
प्रतिमा सिन्हा (Pratima Sinha) अब तक 15 नाटक लिख चुकी हैं जिसमें अस्मिता का प्रश्न, हादसे के बाद, हमसे सिर्फ देह नहीं, आह्वान, मोड़, अवरुद्ध व अन्य हैं। 1999 में हमने पहला स्टेज प्रोग्राम पं. हरिराम द्विवेदी लिखित नृत्य नाटिका बुद्ध चरित्र में सूत्रधार के रूप में किया था। संकट मोचन संगीत समारोह में उद्घोषिका के रूप में भी मेरा परिचय बड़े महंत से पं. हरिराम द्विवेदी ने कराया था।