Ramleela: अपनी मां कैकेयी के उम्मीदों पर भरत ने पानी फेर दिया। जिस मां ने अपने बेटे के सिर पर महाराज का मुकुट देखने के लिए कैकेयी ने चाल चली, जिसके लिए उसने अयोध्या के लोगों को दुःख के सागर में डुबो दिया और राजा दशरथ ने अपने प्राण त्याग दिए। उसी भरत ने अयोध्या के राजपाट को एक सिरे से नकार दिया। इतना ही नहीं, भरत अयोध्या का राज सिंहासन त्याग श्रीराम को मनाने के लिए वन को चल पड़ते हैं।
श्री राम के वन जाने [Ramleela] के बाद भरत अपनी ननिहाल से लौटे, तो कैकेयी उनके आने की खबर पाकर आरती लेकर दौड़ती है। वह अपने नैहर का समाचार पूछती है, तो भरत कहते हैं कि सब ठीक है। भरत अपने माता से अपने कुल का कुशल पूछते हैं और श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के बारे में बताने को कहते हैं। जब कैकेयी उनको अपनी करनी के बारे में बताती है तो वह उसे जितना हो सकता है, उतना भला बुरा कहते हैं।

शत्रुघ्न मंथरा को एक लात मारते हैं। वह वहीं गिर पड़ती है। शत्रुघ्न उसकी चोटी पड़कर घसीटने लगते हैं। भरत उन्हें रोक देते हैं। दोनों भाई माता कौशल्या के पास जाते हैं और भरत अपने आप को कोसते हैं। यह देख कौशल्या उन्हें समझती हैं कि होनी को कोई टाल नहीं सकता।
Ramleela: कुलगुरु वशिष्ठ ने भरत से सिंहासन संभालने को बोला
इसके बाद गुरु वशिष्ठ उनसे अयोध्या का राज सिंहासन [Ramleela] संभालने को कहते हैं। जिससे वह इंकार कर देते हैं। भरत सभी को साथ लेकर श्रीराम को मनाने के लिए वन को चल पड़ते हैं। भरत को आते देख निषाद राज को भ्रम हो जाता है। वे अपना धनुष बाण मंगा लेते हैं। सेवक उनके धैर्य न खोने की सलाह देते हैं। वह भरत से मिलने चल देते हैं। गुरु वशिष्ठ भरत को बताते हैं कि यह राम के मित्र हैं। निषाद राज भरत को लेकर सभी के साथ गंगा तट पर पहुंचते हैं।

गंगा पार करके सभी प्रयाग पहुंचते हैं। उसी समय आकाशवाणी होती है कि तुम व्यर्थ की ग्लानि करते हो तुम्हारे सामान श्रीराम को प्यार और कोई नहीं है। देवता भरत को धन्य कहकर पुष्प वर्षा करते हैं। भरत भारद्वाज मुनि के आश्रम पहुंचकर विश्राम करते हैं। उधर चित्रकूट में भगवान की आरती के बाद लीला को विश्राम दिया गया है।