Ramnagar Ramleela: श्रीहरि के रामावतार की लीलाएं अनंत चतुर्दशी से गंगा पार रामनगर में एक बार पुन पेट्रोमैक्स की रोशनी में मुखर होंगी। दो सौ वर्षों से अधिक प्राचीन घुमंतू रामलीला अपने पुरुष प्रधान पात्रों और बिना ध्वनि विस्तारक यंत्रों के मंचन के लिए दुनिया में चर्चित है। 17 सितंबर यानि आज से शुरू होने वाली विश्व प्रसिद्ध रामलीला की सभी तैयारियां पूर्ण कर ली गई हैं।
लीला से संबंधित पंच स्वरूपों ने दोहे, हाव-भाव आदि को मन-मस्तिष्क में बैठा लिया है। पक्की पर बालकांड के 175 दोहों का पाठ भी पूरा हो गया। किला प्रशासन (Ramnagar Ramleela) ने पुतला निर्माण, परंपरागत पेट्रोमैक्स की व्यवस्था व लीला स्थल की सफाई करा ली है। काशिराज परिवार के प्रतिनिधि कुंवर अनंत नारायण सिंह प्रतिदिन लीलास्थल पर मौजूद रहेंगे।
Ramnagar Ramleela: पात्र से नेमी तक के लिए नियम
रामनगर की लीला (Ramnagar Ramleela) के पात्रों से लेकर लीला के नेमियों तक के लिए कई नियम हैं। खास बात यह है कि नियमों के पालन में अब भी रामनगर की रामलीला का एक कीर्तिमान है। पंचस्वरूप बनने वाले पात्रों के लिए नियमों की शृंखला कुछ ज्यादा लंबी और कड़ी है।
सुनकर पात्रों का चयन करते थे महाराज
पूर्व काशी नरेश डॉ. विभूतिनारायण सिंह ने अपने जीवनकाल में पंच पात्रों के स्वरूपों का चयन कभी देखकर नहीं किया। महाराज संध्या वंदन के बाद मंदिर (Ramnagar Ramleela) में रहते थे। बाहर किशोर मानस के दोहों का पाठ करते। शैली-स्वर के आधार पर वह पात्रों का चयन करते थे।
सबकी ललक जस की तस
महंगाई के इस दौर में नाममात्र मेहनताना मिलने के बावजूद लोगों में रामलीला में काम करने की ललक जस की तस है। राम भजो की दुकान एक उदाहरण है। इस दुकान के मालिक और दुकान पर आने वाले खरीदार-सब बदल गए परन्तु दुकान जस की तस है।
कई अविश्वसनीय घटनाएं सबको करती हैं रोमांचित
रामनगर की रामलीला (Ramnagar Ramleela) में कई बार ऐसी परिस्थिति बनी जब लगा कि आगे की लीला कैसे होगी, लेकिन हर बार कोई न कोई समाधान मिल जाता और लीला का क्रम नहीं टूटा। वह चाहे कुंभकर्ण का पुतला गिरने की घटना रही हो या फिर राम लक्ष्मण के स्वरूपों को लेकर हुआ विवाद। रामनगर की रामलीला में कई बार बड़े हादसे होते-होते टल गए। रामलीला (Ramnagar Ramleela) के लिखित इतिहास में कुछ घटनाएं दर्ज भी हैं। वर्ष 1941-42 की रामलीला में दशहरा के दिन कुंभकर्ण का विशाल पुतला अचानक गिर गया था।
उस समय पुतले के चारों तरफ काफी भीड़ थी लेकिन किसी को खरोंच तक नहीं आई थी। 12 सितंबर 1943 को रामलीला की शुरुआत से एक दिन पहले ही राम और लक्ष्मण बने पात्र के ब्राह्मण होने पर मुन्नी लाल नामक व्यक्ति ने सवाल खड़ा कर दिया। उस दिन काशी नरेश रामनगर में नहीं थे। तब रामलीला कमेटी के सदस्यों ने राम बने पात्र को सबके सामने बुलवाया। ब्राह्मण कर्म से संबंधित कई सवाल पूछे गए। दोनों के जवाब से संतुष्ट होने के बाद उन्हें मान्यता दी गई।