संसद का शीतकालीन सत्र कल से शुरू हो रहा है, लेकिन उसकी गर्मी रविवार को ही महसूस हो गई। सर्वदलीय बैठक में विपक्ष ने जिस तरह एक स्वर में SIR (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन) को हथियार बना लिया, उससे साफ है कि आने वाले पखवाड़े में सदन की दीवारें हंगामे की लपटों से काँपेंगी। यह सिर्फ एक प्रशासनिक अभ्यास का सवाल नहीं रह गया है; विपक्ष इसे “वोट की डकैती” और “लोकतंत्र पर हमला” बता रहा है।
बैठक में कांग्रेस, टीएमसी, डीएमके, सपा, राजद से लेकर छोटे दल तक सबने एक ही स्वर में चेतावनी दी: अगर SIR पर खुली बहस नहीं हुई तो सदन चलने नहीं दिया जाएगा। BLO के कथित आत्महत्या के मामले, लाखों-करोड़ों मतदाताओं के नाम कटने का डर, घुसपैठियों के नाम जोड़ने और असली मतदाताओं को “संदिग्ध” बताकर अपमानित करने का आरोप—विपक्ष ने सारे तीर एक साथ छोड़े। प्रमोद तिवारी ने इसे “वोट चोरी से वोट डकैती” कहा तो गौरव गोगोई ने सीधे सरकार पर “संसद को डिरेल करने की साजिश” का इल्ज़ाम लगाया।

दूसरी तरफ सरकार ने अपना पुराना राग अलापा ये चुनाव आयोग का मामला है, संसद में चर्चा नहीं हो सकती। किरेन रिजिजू ने बैठक को “सकारात्मक” बताया, लेकिन कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया। जेडीयू के संजय झा ने विपक्ष पर पलटवार किया कि बिहार में यही SIR बिना किसी हंगामे के हो गया, वोटिंग प्रतिशत भी बढ़ा, एक भी BLO ने आत्महत्या नहीं की तो पड़ोस के बंगाल में यह नाटक क्यों? उन्होंने चुटकी ली कि ऐसे ही तमाशा करते रहे तो अगले चुनाव में बिहार से भी बुरी हार होगी।
अविश्वास का प्रतीक बना SIR
सच यह है कि SIR अब सिर्फ एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं रहा। यह 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से चले आ रहे उस अविश्वास का प्रतीक बन गया है, जिसमें विपक्ष को लगता है कि सत्ता उसके वोट बैंक को ही सिकोड़ने पर तुली है। बिहार में यह शांति से हो गया, यह सच है। लेकिन बंगाल, उत्तर प्रदेश, झारखंड, असम जैसे राज्यों में जो शोर है, वह सिर्फ राजनीतिक नहीं है वह उन लाखों गरीब, प्रवासी, बुजुर्ग मतदाताओं की बेचैनी भी है जिन्हें अचानक अपने वोटर कार्ड की वैधता साबित करने को कहा जा रहा है।

SIR के कारण BLO कर रहे आत्माहत्या
सवाल बड़ा है क्या चुनाव आयोग वाकई निष्पक्ष है या वह किसी अदृश्य दबाव में काम कर रहा है? क्या BLO पर दबाव इतना ज़्यादा है कि आत्महत्या तक की नौबत आ रही है? और सबसे अहम, अगर यह प्रक्रिया पारदर्शी और न्यायसंगत है तो सरकार चर्चा से क्यों भाग रही है? संसद को चुप कराकर क्या हम लोकतंत्र की आत्मा को ही चुप नहीं कर रहे?
शीतकालीन सत्र होगा सबसे छोटा सत्र
शीतकालीन सत्र महज़ 15 कार्य दिवस का है सबसे छोटा सत्र। अगर पहले ही दिन SIR पर हंगामा हुआ तो बाकी मुद्दे महंगाई, बेरोजगारी, दिल्ली में लगातार हो रहे ब्लास्ट, प्रदूषण, किसान, विदेश नीति की कथित नाकामी सब दबकर रह जाएँगे। यह हार सरकार की नहीं, संसद की होगी। और अंततः लोकतंत्र की।
कल मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में विपक्ष अपनी रणनीति अंतिम रूप देगा। सरकार के पास अभी भी वक्त है कि वह चर्चा की मेज सजाए, न कि सदन को युद्धक्षेत्र बनने दे। नहीं तो ठंड के इस मौसम में संसद की तपिश इतनी बढ़ जाएगी कि कोई भी इससे बच नहीं पाएगा न सत्ता, न विपक्ष, न जनता।

