उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव (Election) में अभी एक साल का वक्त है, लेकिन सियासी हलचल तेज़ हो चुकी है। लंबे समय से सत्ता से दूर रही मायावती इस बार बेहद सक्रिय दिख रही हैं। अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान करने वाली बीएसपी प्रमुख ने प्रत्याशियों की घोषणा शुरू कर दी है और पहला टिकट ब्राह्मण नेता को देकर बड़ा संदेश दिया है।
आशीष पांडेय को मिला पहला टिकट
बीएसपी ने जालौन जिले की माधौगढ़ सीट से आशीष पांडेय को उम्मीदवार बनाया है। यही नहीं, उन्हें सीट का प्रभारी भी घोषित किया गया है। माधौगढ़ बीएसपी (Election) का गढ़ माना जाता है और 2017 के चुनाव में पार्टी यहां दूसरे स्थान पर रही थी। सूत्रों के मुताबिक, होली के बाद कानपुर मंडल की पांच और सीटों पर प्रभारियों की घोषणा होगी। बीएसपी की परंपरा रही है कि चुनाव से पहले घोषित प्रभारी ही प्रत्याशी बनते हैं।
Election: ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश
पहला टिकट ब्राह्मण बिरादरी को देकर मायावती (Election) ने स्पष्ट कर दिया है कि उनकी रणनीति इस समाज को साधने की है। वह पहले भी ब्राह्मणों की उपेक्षा पर चिंता जता चुकी हैं। 7 फरवरी की बैठक में उन्होंने कहा था कि बीजेपी सरकार में सभी वर्ग त्रस्त हैं, लेकिन ब्राह्मण समाज उपेक्षा और असम्मान के खिलाफ सबसे मुखर है।
‘घूसखोर पंडित’ पर नाराजगी
हाल ही में आई फिल्म घूसखोर पंडित को लेकर मायावती ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी। उन्होंने इसे ब्राह्मण समाज का अपमान बताया और केंद्र सरकार से तुरंत बैन लगाने की मांग की। 6 फरवरी को अपने आधिकारिक पोस्ट में उन्होंने लिखा कि फिल्मों में पंडित को घूसखोर बताना पूरे समाज का अपमान है और इससे गहरा रोष व्याप्त है।
जन्मदिन पर भी जताया दर्द
15 जनवरी को अपने 70वें जन्मदिन पर मायावती ने कहा था कि बीएसपी ने हमेशा ब्राह्मण बिरादरी को सम्मान और प्रतिनिधित्व दिया है। उन्होंने यह भी बताया कि बीजेपी, सपा और कांग्रेस (Election) से जुड़े कई ब्राह्मण नेता उनसे मिले और अपनी उपेक्षा पर नाराजगी जताई। मायावती ने अपने शासनकाल का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी सरकार ने दलितों के साथ-साथ अन्य समुदायों के लिए भी काम किया।
2007 की यादें और 2027 का फॉर्मूला
मायावती ने पहले ही ऐलान कर दिया है कि उनकी पार्टी अकेले चुनाव लड़ेगी। ब्राह्मणों से उनका रिश्ता नया नहीं है। 2007 में उन्होंने “हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा-विष्णु महेश है” जैसे नारों से ब्राह्मणों को लुभाया और शानदार सोशल इंजीनियरिंग के जरिए सत्ता पर कब्जा किया। उस चुनाव में दलित और ब्राह्मण वोटों के गठजोड़ ने उन्हें पूर्ण बहुमत दिलाया था। अब मायावती उसी फॉर्मूले को दोहराने की कोशिश कर रही हैं।
मायावती का पहला टिकट ब्राह्मण नेता को देना सिर्फ एक चुनावी घोषणा (Election) नहीं, बल्कि आने वाले साल की राजनीति का संकेत है। यह कदम बताता है कि बीएसपी प्रमुख फिर से सोशल इंजीनियरिंग के उसी रास्ते पर लौट रही हैं, जिसने उन्हें 2007 में सत्ता दिलाई थी। सवाल यही है कि क्या 2027 में मायावती का यह दांव फिर से इतिहास दोहराएगा।

