Varanasi: 16 अंकों का विशेष महत्व रखने वाले सोरहिया मेले की शुरुआत हो चुकी है। काशी के लक्खा मेले में शुमार यह सोरहिया मेला (sorahiya mela) शहर के लक्सा इलाके स्थित लक्ष्मीकुंड महालक्ष्मी मंदिर में हर साल बड़े ही हर्सोल्लास के साथ लगता है और 16 दिनों तक चलता है। 16 दिन इसीलिए क्योंकि इस मेले में 16 अंकों का विशेष महत्व है और यह सोरहिया मेला 16वें दिन जीवित पुत्रिका या ज्यूतिया व्रत के साथ समाप्त हो जाता है।

धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ा काशी का यह सोरहिया मेला, जिसे लेकर लोगों में खास तौर पर महिलाओं में उत्साहिता नजर आती है, इसकी शुरुआत रविवार को धूमधाम से हो चुकी है।

तड़के सुबह से ही श्रद्धालुओं का रेला लक्ष्मीकुंड पर उमड़ पड़ा और माता लक्ष्मी (Varanasi) का दर्शन-पूजन करने का सिलसिला शुरू हो गया। परंपरा के अनुसार व्रत की शुरुआत स्नान और आचमन से हुई, जिसके बाद महिलाएं मां महालक्ष्मी के दर्शन और पूजन में लीन हो गईं। मंदिर परिसर (sorahiya mela) से लेकर कुंड तक भक्तों की भीड़ दिखाई दी।

Varanasi: 16 अंक का है विशेष महत्व
सोरहिया व्रत और पूजन (sorahiya mela) पूरी तरह से 16 अंक पर आधारित है। इसमें 16 अंकों का विशेष महत्व है। श्रद्धालु 16 गाँठ का धागा बांधकर 16 दिन तक मां लक्ष्मी का व्रत रखते हैं। इस दौरान 16 आचमन के बाद देवी विग्रह की 16 परिक्रमा की जाती है। पूजा में 16 चावल के दाने, 16 दूर्वा और 16 पल्लव अर्पित किए जाते हैं। 16 गांठ का धागा धारण करके व्रती महिलाएं विशेष कथा सुनती हैं, जिसमें 16 शब्दों का महत्व बताया जाता है। व्रत का समापन 16वें दिन जीवित पुत्रिका या ज्यूतिया व्रत के साथ होता है।

पौराणिक मान्यता
बात अगर इस पूजा के पौराणिक मान्यताओं की करें तो उसके अनुसार, इस कुंड की स्थापना महर्षि अगस्त ने की थी। और ऐसा वर्णित है कि राजा ज्यूत को संतान की प्राप्ति नहीं हो रही थी। उन्होंने मां लक्ष्मी (sorahiya mela) की आराधना की। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर देवी ने दर्शन दिए और लक्ष्मीकुंड (Varanasi) पर 16 दिन तक व्रत-पूजन करने की प्रेरणा दी। राजा ने यह व्रत किया और उन्हें संतान की प्राप्ति हुई। तभी से यह परंपरा आज तक जीवित है।

मेले (sorahiya mela) के पहले दिन से ही लक्ष्मीकुंड परिसर में धार्मिक उल्लास का माहौल देखने को मिला। महिलाओं ने पारंपरिक गीत गाए और धागा धारण कर पूजा में बैठीं। सुबह और शाम आरती के समय मंदिर भक्तों से खचाखच भर गया।