Dala chhath:बाबा विश्वनाथ की पावन नगरी पिछले चार दिनों से बिहार की सांस्कृतिक धड़कन बन गई। काशी एक बार फिर लोक आस्था, श्रद्धा और भारतीय संस्कृति के रंगों से सराबोर दिखी। चार दिनों की कठोर तपस्या का अंतिम चरण वाराणसी में एक अलौकिक दृश्य बनकर उभरा, जहां गंगा किनारे छठव्रतियों की भीड़ ने नदियों को जीवंत कर दिया। उदयीमान सूर्य को अर्घ्य देकर व्रती महिलाओं ने परिवार की सुख-समृद्धि, संतान की दीर्घायु और समाज के कल्याण की कामना की। और इसी के साथ ही समापन हुआ महापर्व डाला छठ का….

गूंज उठे “जय छठी मइया” के जयघोष
काशी के अस्सी घाट से लेकर (Dala chhath) दशाश्वमेध, राजघाट और अन्य सभी घाटों पर हर ओर सुबह-सुबह श्रद्धा का सैलाब उमड़ पड़ा। जैसे ही सुबह सूर्यदेव की पहली किरण श्रद्धालुओं को नजर आई, घाटों पर “हर-हर महादेव”, “जय सूर्यदेव” और “जय छठी मइया” के जयघोष गूंज उठे। व्रती महिलाएं जल में खड़ी होकर भगवान भास्कर की आराधना में लीन रहीं। उनके हाथों में पूजा के सूप, दीपक और कलश रहे, और आंखों में केवल एक ही भाव — आस्था का अटूट विश्वास।

36 घंटे की कठिन तपस्या हुई पूरी
रातभर कहीं घाटों पर तो कहीं लोगों के घरों में ही भजन-कीर्तन का दौर चलता रहा। कई व्रती महिलाएं अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य देने के बाद गंगा घाट पर ही रुक गई और भोर में पुनः गंगा स्नान कर पूजा-अर्चना में जुट गईं। एक-एक करके सभी व्रतियों ने अर्घ्य देते हुए अपने इस 36 घंटे की कठिन तपस्या (Dala chhath) को पूरा किया. “छठ मइया के गीत” और “सूर्य स्तुति” से पूरा वातावरण पावन हो उठा। हालांकि कई बार बूंदाबांदी भी हुई लेकिन बावजूद इसके श्रद्धालुओं का उत्साह कम नहीं। हल्की फुहारें और अचानक ठिठुरन भरी ठंड ने मौसम को चुनौतीपूर्ण बना दिया, मगर व्रतियों की दृढ़ता ने सब पर विजय पाई।

श्रद्धालुओं का कहना है कि यह पर्व (Dala chhath) न सिर्फ सूर्य उपासना का प्रतीक है बल्कि यह मानव और प्रकृति के बीच अटूट संबंध को दर्शाता है। यह व्रत संतान की दीर्घायु और परिवार की समृद्धि के लिए किया जाता है। इसमें दिखावा नहीं, सिर्फ श्रद्धा और शुद्धता का महत्व है।

तगड़ी रही सुरक्षा व्यवस्था
वहीं छठ के अवसर पर वाराणसी प्रशासन भी पूरी तरह से मुस्तैद नजर आया। घाटों पर (Dala chhath) भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस, एनडीआरएफ और जल पुलिस की टीमें तैनात रहीं। श्रद्धालु सुरक्षित और शांतिपूर्ण माहौल में पूजा कर सकें, यही उनकी प्राथमिकता रही। इसके अलावा, नगर निगम की ओर से घाटों पर प्रकाश, सफाई, मेडिकल कैंप और बैरिकेडिंग की व्यवस्था की गई थी।

उगते सूर्य को अर्घ्य देने के बाद व्रती महिलाओं ने अपने व्रत का समापन किया। महिलाओं ने एक दूसरे को सिंदूर लगाया और सभी के बीच ठेकुआ, कसरी, केला, नारियल और गन्ने से सजे प्रसाद का वितरण किया। इसके बाद कच्चा दूध पीकर अपना व्रत खोला। सचमुच छठ का यह पर्व न केवल सूर्य उपासना (Dala chhath) का प्रतीक है, बल्कि मातृभक्ति और संयम की जीवंत मिसाल। काशी के घाटों ने इस बार फिर साबित किया कि आस्था की जड़ें कितनी गहरी हैं, जो हर विपदा में भी फलती-फूलती रहती हैं।

