Varanasi 16 दिसंबर 2025– वाराणसी की पवित्र नगरी में एक नया विवाद जन्म ले चुका है। नगर निगम द्वारा मठ और मंदिरों पर लगाए गए टैक्स ने संत समाज को आंदोलित कर दिया है। संतों का कहना है कि यह कदम उन्हें औरंगजेब के दौर की याद दिलाता है, जब धार्मिक स्थलों पर जजिया कर लगाया जाता था। अब वही काम आधुनिक प्रशासन कर रहा है—ऐसा आरोप संतों ने नगर निगम पर लगाया है।
नोटिस से मचा हड़कंप
Varanasi नगर निगम ने कई मठों को टैक्स न जमा करने पर नोटिस जारी किया है। नोटिस में साफ लिखा है कि 15 दिनों के भीतर टैक्स न चुकाने पर मठों की संपत्ति कुर्क कर ली जाएगी। इस चेतावनी ने संत समाज को झकझोर दिया और पातालपुरी मठ में एक आपात बैठक बुलाई गई।
Varanasi: पातालपुरी मठ से देशव्यापी आह्वान
बैठक में रामबालक दास ने 20 हजार मठ-मंदिरों को ‘राम नाम की पाती’ भेजने का निर्णय लिया। पत्र के जरिए संत समाज को एकजुट होकर टैक्स (Varanasi) का विरोध करने का आह्वान किया जा रहा है। रामबालक दास ने कहा कि धार्मिक स्थलों पर टैक्स लगाना अभूतपूर्व है और यदि इसे वापस नहीं लिया गया तो संत आमरण अनशन करेंगे। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि जिन मठ-मंदिरों की जमीन पर व्यवसायिक गतिविधियां होती हैं, वहां टैक्स लगना उचित है।
निगम का पक्ष और संतों की मांग
नगर निगम अधिकारियों (Varanasi) ने जांच के बाद मठों का गृहकर (हाउस टैक्स) माफ कर दिया है। लेकिन सीवर और जलकर को लेकर निगम ने बिल जारी किया है। संतों का कहना है कि मठ-मंदिरों की कोई आय नहीं होती, ऐसे में इन करों का भुगतान असंभव है। उनका सीधा तर्क है कि धार्मिक स्थल पूरी तरह टैक्स मुक्त होने चाहिए।
संघर्ष की आहट
काशी के संतों ने साफ चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें नहीं मानी गईं, तो यह आंदोलन देशव्यापी रूप लेगा। नगर निगम का कहना है कि नियमों के तहत टैक्स लगाया गया है, जबकि संत इसे धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला मान रहे हैं।
Varanasi की गलियों में यह विवाद अब सिर्फ टैक्स का नहीं रहा, बल्कि आस्था बनाम प्रशासन की लड़ाई का रूप ले चुका है। संतों का आक्रोश और नगर निगम का नियमों पर अडिग रहना—दोनों मिलकर काशी को एक बड़े टकराव की ओर धकेल रहे हैं।

