Varanasi की गलियों में जब मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ठेठ बनारसी अंदाज़ में लोगों से मुखातिब हुए, तो यह सिर्फ़ एक औपचारिक दौरा नहीं था। यह उस भावनात्मक पुल का प्रतीक था जो महाकाल की नगरी उज्जैन से लेकर बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी तक फैला हुआ है।
आस्था का आलोक
सोमवार की सुबह डॉ. मोहन यादव ने श्री काशी विश्वनाथ मंदिर (Varanasi) में विधिवत पूजन-अर्चन कर बाबा का आशीर्वाद लिया। बाहर निकलते ही उन्होंने कहा— “मैं महाकाल की नगरी से आता हूं, इसलिए श्रीकाशी विश्वनाथ के दर्शन के आनंद को समझता हूं।” यह वक्तव्य केवल व्यक्तिगत श्रद्धा नहीं, बल्कि दो महान धरोहरों—महाकाल और विश्वनाथ—के बीच आध्यात्मिक एकता का उद्घोष था।
इसके बाद उन्होंने काल भैरव मंदिर (Varanasi) में भी पूजा की और हाथ में काला धागा बंधवाया। यह दृश्य बताता है कि सत्ता के शिखर पर बैठे नेता भी जब काशी आते हैं, तो वे सबसे पहले आस्था की गलियों में ही खुद को समर्पित करते हैं।
बनारसी अंदाज़ में मुख्यमंत्री
काशी की गलियों में घूमते हुए मुख्यमंत्री (Varanasi) ने आमजन से संवाद किया। एक दुकान पर रुककर उन्होंने दुकानदार से पूछा— “क्या खिलाओगे?” और फिर चखी बनारस की मशहूर मिठाई ‘मलाईयो’। यह क्षण बताता है कि राजनीति और पद की औपचारिकता से परे, एक नेता जब जनता से जुड़ता है तो उसका सबसे सशक्त माध्यम स्थानीय संस्कृति और स्वाद ही होता है।
Varanasi:राजनीति का संदेश
पत्रकारों से बातचीत में डॉ. यादव ने बिहार के मंत्री नितिन नबीन को भाजपा का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने पर शुभकामनाएं दीं। उन्होंने कहा कि नितिन नबीन युवा हैं, संगठन और सरकार दोनों का अनुभव रखते हैं और निश्चित ही पार्टी को आगे बढ़ाएंगे। यह वक्तव्य आस्था के बीच राजनीति का संतुलन साधने का प्रयास था—जहां मंदिरों की गलियों में श्रद्धा झलकती है, वहीं राजनीतिक संदेश भी स्पष्ट रूप से दिया जाता है।
संवेदना और सामाजिक जुड़ाव
Varanasi से निकलकर मुख्यमंत्री जौनपुर पहुंचे, जहां उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार के मंत्री गिरीश चंद्र यादव के दिवंगत पिता की तेरहवीं में शामिल होकर श्रद्धांजलि अर्पित की। यह यात्रा बताती है कि आस्था और राजनीति के बीच संवेदना का सूत्र भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
डॉ. मोहन यादव का वाराणसी दौरा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं था। यह उस सांस्कृतिक और राजनीतिक संवाद का हिस्सा था जिसमें महाकाल और विश्वनाथ की आस्था, बनारसी गलियों का अपनापन, और संगठनात्मक राजनीति का संदेश एक साथ गूँजते हैं।
काशी (Varanasi) की गलियों में ‘मलाईयो’ का स्वाद चखते हुए मुख्यमंत्री ने यह साबित किया कि जनता से जुड़ाव केवल भाषणों से नहीं, बल्कि उनके जीवन और संस्कृति में घुलने-मिलने से होता है।

