”इतिहास में कभी भी विचार -विमर्श से कोई ठोस परिवर्तन नहीं हासिल किया गया है।”
– नेता जी सुभाष चन्द्र बोस
भारत के महान स्वतंत्रता सेनानी नेता जी सुभाष चंद्र बोस की सोमवार को 126वीं जयंती है। देश में नेताजी के अतुलनीय योगदान के लिए उनकी जयंती को पराक्रम दिवस के रूप में भी मनाया जाता है। सुभाष चंद्र बोस का जन्म 23 जनवरी 1897 को ओड़िशा के कटक शहर में एक बंगाली परिवार में हुआ था। वैसे तो स्वतंत्रता संग्राम में नेताजी के अनगिनत योगदान हैं। लेकिन मुख्य रूप से उन्हें द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने और जापान के सहयोग से आजाद हिन्द फ़ौज का गठन करने के लिए जाना जाता है। नेताजी के द्वारा दिया गया नारा ‘जय हिंद’ आज देश का राष्ट्रीय नारा बन गया है।
सुभाष चंद्र बोस, जिसका नाम सुनते ही अंग्रेज अधिकारियों के रौंगटे खड़े हो जाते थे। उनके जीवन से ज्यादा उनके मृत्यु की चर्चाएं देश में होती हैं। इतिहास में शायद ही ऐसा कभी हुआ हो कि किसी नेता की पहेली उसके निधन के 78 वर्ष बाद भी जीवित रही हो। कहा जाता है कि नेताजी की मृत्यु 1945 में एक हवाई दुर्घटना में हुई थी। लेकिन नेताजी का निधन इतिहास के कई पन्नों को अपने भीतर समेटे हुए है। नेताजी को मानने वालों का कहना है कि वे ‘गुमनामी बाबा’ के रूप में कई वर्षों तक जीवित रहे। कई लोगों का यह भी मानना है कि गुमनामी बाबा वास्तव में नेताजी (सुभाष चंद्र बोस) थे, जो नैमिषारण्य, बस्ती, अयोध्या और फैजाबाद में कई स्थानों पर साधु के वेश में रहते थे। वह शहरों के भीतर ही कई जगह बदलते रहते थे।

बाबा मिलते थे केवल ‘विश्वासियों’ से
गुमनामी बाबा के बारे में कहा जाता है कि वे वैरागी थे। उन्होंने केवल कुछ ही विश्वासियों के साथ बातचीत की थी। वही लोग बाबा से मिलने प्रतिदिन आते थे। कहा जाता है कि वे कभी अपने घर से बाहर ही नहीं निकले। अधिकांश लोगों का दावा है कि उनलोगों ने उन्हें दूर से देखा। एक बार उनके एक जमींदार गुरबक्श सिंह सोढ़ी ने उन्हें किसी काम से फैजाबाद सिविल कोर्ट ले जाने की कोशिश दो बार की, लेकिन वे भी असफल रहे। इस जानकारी की पुष्टि उनके बेटे मंजीत सिंह ने गुमनामी बाबा की पहचान के लिए गठित जस्टिस सहाय कमीशन ऑफ़ इन्क्वायरी के समक्ष अपने बयान में की है।
जीवन और मृत्यु दोनों रहस्य
गुमनामी बाबा आखिरकार 1983 में फैजाबाद में राम भवन के एक आउट हाउस में बस गए। जहां 16 सितम्बर, 1985 को उनकी मृत्यु हो गई और दो दिन बाद 18 सितम्बर को उनका अंतिम संस्कार किया गया। आश्चर्यजनक रूप से, इस बात का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि वास्तव में किसी की मृत्यु हुई थी। न तो उस व्यक्ति का मृत्यु प्रमाण पत्र है, न ही शव की कोई तस्वीर है और न ही डाह संस्कार में गए लोगों की कोई तस्वीर या जानकारी है। यहां तक की शमशान प्रमाण पत्र भी नहीं है। वास्तव में गुमनामी बाबा के निधन की जानकारी लोगों को उनकी कथित तौर पर मृत्यु के 42 दिन बाद तक नहीं थी। उनका जीवन और मृत्यु दोनों ही रहस्य में डूबे हुए हैं।
नेता जी युद्ध अपराधी नहीं थे
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के एक प्रसिद्द सर्जन, जो अपना नाम नहीं बताना चाहते, ऐसे ही एक ‘विश्वासी’ थे। उन्होंने कहा, ‘हम भारत सरकार से यह घोषित करने के लिए गुहार लगाते रहे कि नेताजी युद्ध अपराधी नहीं थे। लेकिन हमारी दलीलें अनसुनी कर दी गईं। हमारी ओर किसी ने ध्यान ही नहीं दिया।’
यूपी सरकार ने गुमनामी बाबा के बारे में बताई ये बात
वर्ष 2016 में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस दावे को ख़ारिज कर दिया कि गुमनामी बाबा ही वास्तव में नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। इसके बावजूद नेताजी के समर्थक सरकार के इस दावे को मानने से इंकार करते हैं। गुमनामी ‘विश्वासियों’ ने 2010 में अदालत का रुख किया था। जिसमें उच्च न्यायालय में उनकी याचिका के पक्ष में फैसला सुनाया था। अदालत ने इस मामले में यूपी सरकार को गुमनामी बाबा की पहचान स्थापित करने का निर्देश दिया था। सरकार ने 28 जून, 2016 को न्यायमूर्ति विष्णु सहाय की अध्यक्षता में एक जांच आयोग का गठन किया। जिसके रिपोर्ट में यूपी सरकार ने साबित किया कि गुमनामी बाबा ‘नेताजी के अनुयायी’ थे, लेकिन अनुयायी नहीं थे।