विश्वविख्यात देव दीपावली Dev Deepawali 2025 महोत्सव को लेकर काशी एक बार फिर तैयार है। इसे लेकर मैग्दागिन स्थित पराड़कर स्मृति भवन में मंगलवार को पत्रकार वार्ता का आयोजन किया गया, जिसमें श्री देव दीपावली आरती महासमिति ने इस वर्ष के आयोजन की रूपरेखा और थीम की जानकारी साझा की। समिति के अध्यक्ष आचार्य वागीश दत्त मिश्र, उपाध्यक्ष ने बताया कि इस वर्ष का आयोजन पाँच सूत्रीय थीम पर आधारित होगा- ऑपरेशन सिंदूर, जाति-पंथ अनेक, हम सनातनी एक, घाटों के देवस्थानों का संरक्षण, गांव, गंगा और गीता, नशा मुक्त भारत अभियान।
इन थीम्स के माध्यम से घाटों पर सनातन एकता, नारी सशक्तिकरण, नशा मुक्ति और राष्ट्रीय एकता का संदेश रंगोलियों, सजावट और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के जरिये प्रदर्शित किया जाएगा। दशाश्वमेध और राजघाट पर “ऑपरेशन सिंदूर” की झलक दिखेगी, जबकि नारी सशक्तिकरण थीम पर विशेष रूप से आकर्षक सजावट की जाएगी। इसके अलावा भगवान बुद्ध, जैन धर्म के अहिंसा परमो धर्मः और गुरु नानक देव जी के प्रकाशोत्सव पर भी विशेष अलंकरण होंगे। श्रेष्ठ सजावट करने वाले घाटों को प्रथम, द्वितीय और तृतीय पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा।

126 घाटों पर दीपोत्सव की जगमगाहट
इस वर्ष देव दीपावली (Dev Deepawali 2025) का आयोजन गंगा, वरुणा और गोमती नदी के तटों पर कुल 126 घाटों पर किया जाएगा। लगभग ग्यारह किलोमीटर लंबे क्षेत्र में एक साथ दीप प्रज्वलन और आरती का अद्भुत दृश्य दिखाई देगा। हजारों की संख्या में श्रद्धालु घाटों पर एक साथ दीप जलाकर “धरती पर उतरते देवताओं” का दिव्य दृश्य साकार करेंगे।
देव दीपावली की प्राचीनता और संरक्षण की आवश्यकता
इस दौरान समिति के उपाध्यक्ष पं. गंगाधर उपाध्यायने कहा कि देव दीपावली (Dev Deepawali 2025) की परंपरा सैकड़ों वर्षों पुरानी है। पंचगंगा घाट पर महारानी अहिल्या बाई होल्कर द्वारा सत्रहवीं शताब्दी में निर्मित हजारा दीप स्तंभ इसका जीवंत प्रतीक है। इसी तरह बिंदु माधव मंदिर की सीढ़ियों पर बने प्राचीन दीप स्तंभ भी इस परंपरा के साक्षी हैं।
मगर अब ये पत्थर के दीप स्तंभ जीर्ण अवस्था में हैं, जिनके संरक्षण की तत्काल आवश्यकता है। वक्ताओं ने कहा कि काशी की पहचान उसके देवस्थानों और मंदिरों से है। यदि इन पवित्र स्थलों का संरक्षण नहीं हुआ तो काशी की आध्यात्मिक धरोहर खतरे में पड़ सकती है।
इस बार की देव दीपावली (Dev Deepawali 2025) “जाति-पंथ अनेक, हम सनातनी एक” की भावना को मूर्त रूप देगी। काशी के घाटों पर कबीर, नानक, बुद्ध, महावीर और रविदास की शिक्षाएं एक साथ प्रतिध्वनित होंगी।
साथ ही, “नशा मुक्त भारत अभियान” के अंतर्गत गंगा घाटों को नशामुक्त क्षेत्र घोषित किया जाएगा। इस पहल से काशी न केवल आध्यात्मिक एकता बल्कि सामाजिक सुधार का भी संदेश पूरी दुनिया को देगी।

ब घाटों पर भीड़ बढ़ी, तो वर्ष 2000 में पहली बार देव दीपावली (Dev Deepawali 2025) का आयोजन रामकुंड (श्रीनगर कॉलोनी) से शुरू किया गया। आज यह परंपरा वाराणसी के 90 से अधिक कुंडों और तालाबों तक फैल चुकी है।
इतिहास के आईने में Dev Deepawali 2025
इतिहासकारों के अनुसार, जब औरंगजेब ने काशी विश्वनाथ मंदिर को ध्वस्त किया था, तब वर्षों बाद महारानी अहिल्या बाई होल्कर ने उसी स्थान के पास नया मंदिर बनवाया और बैकुंठ चतुर्दशी के दिन बाबा विश्वनाथ की पुनः प्रतिष्ठा की। अगले दिन कार्तिक पूर्णिमा को दीपदान हुआ—यही दिवस आगे चलकर देव दीपावली के रूप में प्रसिद्ध हुआ। आकाश दीप प्रज्ज्वलित करने की परंपरा भी उसी समय से प्रारंभ हुई थी, जो आज विश्व स्तर पर प्रसिद्ध है।
जब घाटों पर भीड़ बढ़ी, तो वर्ष 2000 में पहली बार देव दीपावली (Dev Deepawali 2025) का आयोजन रामकुंड (श्रीनगर कॉलोनी) से शुरू किया गया। आज यह परंपरा वाराणसी के 90 से अधिक कुंडों और तालाबों तक फैल चुकी है। यहां आयोजन समितियों ने भूजल संरक्षण, स्वच्छता और वृक्षारोपण को जोड़कर इसे जनभागीदारी का उत्सव बना दिया है।

