Varanasi की गलियों में आजकल एक ही नाम गूँज रहा है – शुभम जायसवाल। न कोई फैक्ट्री, न कोई दुकान, न कोई बोतल खुद पैक की, फिर भी महज तीन साल में 150 करोड़ से ज्यादा की काली कमाई। बाइक से लैंड डिफेंडर तक, कॉलेज कैंटीन से होर्डिंग्स तक – यह कहानी किसी बॉलीवुड स्क्रिप्ट से कम नहीं लगती, लेकिन हकीकत इससे कहीं ज्यादा गर्म और खतरनाक है।
राजनीति का सपना, काला रास्ता
शुभम हरिश्चंद्र कॉलेज (Varanasi)का सामान्य सा छात्र था। उसका सपना था नेता बनना, लोगों के बीच नाम कमाना। लेकिन जेब खाली थी। कोरोना के दिनों में एक मेडिकल होलसेलर के यहाँ हिसाब-किताब का छोटा सा काम मिला। वहीं उसे पता चला कि कोडीन वाला कफ सिरप बांग्लादेश में सोने से महंगा बिकता है। बस, यहीं से उसकी जिंदगी ने यू-टर्न लिया।
उसे समझ आ गया था, नशे की यह बोतल भारत में 120 रुपये की है, वहीं ढाका की गलियों में 1500-1800 तक पहुँच जाती है। कारण? बांग्लादेश में शराब पर सख्त पाबंदी। मुस्लिम बहुल देश में अल्कोहल लगभग वर्जित है, परमिट सिस्टम जटिल है। नौजवान कोडीन सिरप को ‘सस्ता नशा’ बना चुके हैं। भारत में बनी हाई-डोज बोतलें वहाँ प्रतिबंधित हैं, इसलिए तस्करी ही एकमात्र रास्ता।

Varanasi फर्जी स्टोर, असली खेल
शुभम ने कागजों पर जाल बिछाया। बनारस (Varanasi) में 28 फर्जी मेडिकल स्टोर, गाजियाबाद में भी कुछ ऐसे ही नाम। गोदामों के पते दिए, जिनके ताले तक नहीं खुले। ऐबट कंपनी की 89 लाख बोतलें ‘बिक गईं’ – कागज पर। असल में ट्रक सीधे त्रिपुरा बॉर्डर की ओर दौड़ते थे। रांची की शैली ट्रेडर्स (जिसके मालिक खुद शुभम के पिता बताए जाते हैं) ने सप्लाई चेन मुहैया कराई। सब कुछ इतना साफ-सुथरा कि ड्रग इंस्पेक्टर भी पहले धोखे में रहे।
जब पर्दा उठा तो पुलिस के होश उड़ गए। 50 लाख बोतलें सिर्फ बनारस में ‘खपत’ दिखाई गई थीं। NDPS एक्ट, मनी लॉन्ड्रिंग, आपराधिक साजिश – सारे गंभीर धारा लगे। शुभम फरार है। उसके लग्जरी फ्लैट, डिफेंडर, रेंज रोवर सब कुर्क हो रहे हैं। इस दीवाली उसने बनारस(Varanasi) के दवा कारोबारियों को सोने-चांदी के वर्क वाली मिठाई भिजवाई थी – डिब्बे पर अपनी तस्वीर लगाकर। आज वही तस्वीर पोस्टर्स पर ‘वांटेड’ बन चुकी है।
बड़ा सवाल
यह सिर्फ एक युवक की महत्वाकांक्षा की कहानी नहीं है। यह उस पूरे सिस्टम की नाकामी है जो कागजों पर सबकुछ ठीक दिखाता है, पर असल में लाखों बोतलें सीमा पार कर जाती हैं। कोडीन सिरप का यह धंधा नया नहीं। त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, असम के बॉर्डर से सालों से यह खेल चल रहा है। लेकिन बनारस (Varanasi)से इतने बड़े पैमाने पर पहली बार हुआ।
शुभम पकड़ा जाए या न जाए, उसकी कहानी एक आईना है – जहाँ राजनीति का सपना पैसों के बिना अधूरा रह जाता है, वहाँ कुछ लोग गलत रास्ता चुन लेते हैं और कुछ ही सालों में ‘किंग’ बन बैठते हैं। सवाल यह है कि अगला ‘किंग’ कौन बनेगा? और हमारा सिस्टम कब तक कागजी गोदामों और फर्जी बिलों के जाल में उलझा रहेगा?
बनारस (Varanasi)की गंगा आज भी बह रही है, पर अब उसकी लहरों में एक नया नाम घुल गया है – शुभम जायसवाल, जिसने सिरप की बोतलों से अपना साम्राज्य खड़ा किया और रातोंरात गायब हो गया।

