SIR: बनारस में अक्सर कहा जाता है कि यहां गंगा उल्टी बहती है। यह कहावत अब मतदाता सूची में भी साकार हो गई है। विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण अभियान (SIR) के दौरान जो विसंगतियां सामने आईं, वे न केवल प्रशासनिक चूक को उजागर करती हैं बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े करती हैं।
SIR के बाद ड्राफ्ट सूची में चौंकाने वाला खुलासा
SIR प्रक्रिया के बाद मंगलवार को जारी ड्राफ्ट सूची ने पूरे शहर में हलचल मचा दी। जहां एक ओर लाखों नाम कटने की शिकायतें सामने आईं, वहीं दूसरी ओर काशी विश्वनाथ धाम परियोजना के लिए ध्वस्त किए गए मकानों में रहने वालों के नाम अब भी सूची में दर्ज पाए गए। मकान का अस्तित्व नहीं, निवासी कहीं और जा चुके हैं, लेकिन मतदाता सूची में मकान नंबर और नाम जस के तस मौजूद हैं।
कालिका गली और लाहौरी टोला का मामला
स्थानीय नागरिकों ने ऑनलाइन खोजबीन में दो भवनों का उदाहरण दिया। कालिका गली स्थित भवन संख्या डी-8/34 में रंजू झा और साक्षी झा के नाम मतदाता सूची में दर्ज हैं। वहीं लाहौरी टोला स्थित भवन संख्या डी-1/59 में दीपक मिश्र, सूरज मिश्र और राजकुमार को मतदाता बताया गया है। ये सभी लोग पहले किराएदार थे, लेकिन अब कहीं और रह रहे हैं। दोनों भवनों को विश्वनाथ धाम परियोजना में पहले ही समाहित किया जा चुका है।
असली मकानों से गायब असली लोग
विडंबना यह है कि जिन मकानों का अस्तित्व अब भी बना हुआ है और जहां दर्जनों लोग रहते हैं, वहां के अधिकांश निवासियों के नाम सूची से गायब हैं। संबंधित मतदाताओं का कहना है कि उन्होंने समय पर सभी आवश्यक जानकारियां एसआईआर फॉर्म में दी थीं, फिर भी उनका नाम सूची से हटा दिया गया। यह स्थिति प्रशासनिक लापरवाही की ओर इशारा करती है।
प्रशासन की सफाई और आगे की राह
एडीएम (प्रशासन) एवं उप जिला निर्वाचन अधिकारी बिपिन कुमार ने कहा है कि मामले की जांच कराई जाएगी। जिन लोगों के नाम गलत तरीके से दर्ज या हटाए गए हैं, उन्हें चिह्नित कर फॉर्म-8 भरवाया जाएगा और उनके नाम सही बूथों पर स्थानांतरित किए जाएंगे। हालांकि सवाल यह है कि जब लोकतंत्र की नींव मतदाता सूची पर टिकी है, तो ऐसी चूकें आखिर कैसे हो रही हैं।
बनारस का यह मामला केवल स्थानीय विसंगति नहीं है, बल्कि यह पूरे चुनावी तंत्र की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न है। जब ध्वस्त मकानों में रहने वाले “भूतिया वोटर” सूची (SIR) में दर्ज हों और असली नागरिकों के नाम गायब हों, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर गहरी चोट लगती है। यह कारनामा प्रशासनिक सुधार की मांग करता है, ताकि मतदाता सूची सचमुच जनता की आवाज़ का प्रतिबिंब बन सके।

