Mahashivratri 2026: देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी एक बार फिर महाशिवरात्रि के महापर्व पर आस्था, लोकाचार और शास्त्रीय परंपराओं के अद्भुत संगम की साक्षी बनने जा रही है। विश्वनाथ धाम में तैयारियां अंतिम चरण में हैं। इस वर्ष शिव–गौरा का विवाहोत्सव और भी विशेष होगा—जब बाबा विश्वनाथ और माता गौरा नवग्रहों की पवित्र लकड़ियों से निर्मित विशेष काष्ठ पट्ट पर विराजमान होकर भक्तों को दर्शन देंगे।
यह काष्ठ पट्ट केवल एक आसन नहीं, बल्कि प्रकृति, ग्रह-ऊर्जा और लोक-कल्याण का प्रतीक है, जिसे देश के पांच राज्यों से लाई गई 11 प्रकार की पवित्र लकड़ियों से शास्त्रीय विधि के अनुसार तैयार किया गया है।
शास्त्र, प्रकृति और लोक परंपरा का संगम
महाशिवरात्रि (Mahashivratri 2026) पर काशीपुराधीश्वर भगवान विश्वनाथ का विवाहोत्सव सदियों से लोकजीवन का हिस्सा रहा है। इस बार यह परंपरा और गहन अर्थ के साथ जीवंत होगी। आयोजकों के अनुसार, बाबा विश्वनाथ और माता गौरा नवग्रहों के अनुरूप चयनित वृक्षों की लकड़ियों से बने काष्ठ पट्ट पर विराजमान होंगे। धार्मिक मान्यता है कि इन काष्ठों का प्रयोग ग्रहदोष शांति, सकारात्मक ऊर्जा और लोकमंगल का संदेश देता है।

आयोजक वाचस्पति तिवारी बताते हैं कि काष्ठ पट्ट का निर्माण शास्त्रसम्मत विधि से किया गया है, ताकि शिव–गौरा के विवाह लोकाचार में प्रकृति और ग्रहों की दिव्य शक्ति समाहित हो सके। वहीं, ‘शिवांजलि’ के संयोजक संजीव रत्न मिश्र कहते हैं—काशी की परंपरा में हर अनुष्ठान शास्त्र, प्रकृति और मानव जीवन के गहरे रिश्ते को दर्शाता है। यह क्षण शिवभक्तों के लिए दुर्लभ और अलौकिक होगा।
नवग्रहों की लकड़ियां, 11 काष्ठों का दिव्य संयोजन
काष्ठ पट्ट के निर्माण में नवग्रहों के प्रतीक वृक्षों का विशेष चयन किया गया है—
- सूर्य के लिए अर्क (मदार)
- चंद्र के लिए पलाश (ढाक)
- मंगल के लिए खदिर (खैर)
- बुध के लिए अपामार्ग (लटजीरा)
- गुरु के लिए पीपल
- शुक्र के लिए औदुम्बर (गूलर)
- शनि के लिए शमी
- राहु के लिए दुर्वा
- केतु के लिए कुशा
इनके साथ अक्षोड (अखरोट) और शाक (सागवान) की लकड़ी को सम्मिलित कर कुल 11 प्रकार के काष्ठों से यह दिव्य काष्ठ पट्ट तैयार किया गया है।
इन लकड़ियों का संग्रह केवल काशी तक सीमित नहीं रहा। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कश्मीर, उत्तराखंड, बिहार और असम से शिवभक्तों ने इन्हें श्रद्धा के साथ काशी पहुंचाया। इस तरह, काष्ठ पट्ट में देश के विभिन्न अंचलों की आस्था भी समाहित हो गई है।

महाशिवरात्रि (Mahashivratri 2026) से पूर्व 13 फरवरी को हल्दी और शगुन के लोकाचार निभाए जाएंगे। टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर तैयारियां पूर्ण कर ली गई हैं। परंपरानुसार बाबा विश्वनाथ और माता गौरा की चल प्रतिमाएं काष्ठ पट्ट पर विराजमान की जाएंगी और मांगलिक अनुष्ठान संपन्न होंगे।
महाशिवरात्रि के दिन विशेष शृंगार, पूजन और विवाह के सभी लोकाचार विधि-विधान से पूरे किए जाएंगे। नवग्रहों की लकड़ियों से बने काष्ठ पट्ट का उपयोग हल्दी की रस्म में भी किया जाएगा—जो इस आयोजन को और अधिक पवित्र बनाता है।
दूल्हे के रूप में बाबा: रुद्राक्ष और मेवों का सेहरा
महाशिवरात्रि पर बाबा विश्वनाथ दूल्हे के रूप में भक्तों को दर्शन देंगे—यह काशी की सदियों पुरानी परंपरा है। इस अवसर पर बाबा का शृंगार विशेष रूप से आकर्षक होगा। रुद्राक्ष, फल, मेवा और पुष्पों से निर्मित सेहरा बाबा के मस्तक को सुशोभित करेगा।
आयोजक बताते हैं कि रुद्राक्ष से बना सेहरा बाबा की वैराग्य परंपरा और शिवतत्व (Mahashivratri 2026) का प्रतीक है, जबकि फल, मेवा और पुष्प मंगलभाव, समर्पण और लोकाचार को दर्शाते हैं। सेहरे में रुद्राक्ष के साथ मखाना, लौंग, इलायची, अंगूर और सुगंधित पुष्पों का प्रयोग होगा—जो पूरी तरह प्राकृतिक और धार्मिक सामग्री से तैयार किए जाएंगे।
Mahashivratri 2026: शिव बरात और चारों पहर की आरती
टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत के आवास से शिव बरात निकलेगी। इसके बाद श्रीकाशी विश्वनाथ धाम (Mahashivratri 2026) में रातभर चारों पहर की आरती के दौरान बाबा को यह सेहरा अर्पित किया जाएगा। बाबा की चल प्रतिमा सहित मंदिर में होने वाली आरती के दौरान यह सेहरा विराजमान रहेगा।
महाशिवरात्रि (Mahashivratri 2026) के दिन चारों पहर की सप्तर्षि आरती होगी, जिसका संचालन पं. शशिभूषण त्रिपाठी ‘गुड्डु महाराज’ के नेतृत्व में किया जाएगा। शंख-नाद, मंत्रोच्चार और भक्तों के जयघोष के बीच पूरा धाम शिवमय हो उठेगा।

