- राधेश्याम कमल
Ancient Durga Pooja: काशी के दुर्गा पूजा के इतिहास में चौखम्भा स्थित बंगाली ड्योढ़ी में होने वाली दुर्गापूजा अति प्राचीन है। यह दुर्गा पूजा 1773 में प्रारंभ हुई। आयोजक इसे काशी में होने वाली पहली दुर्गापूजा मानते हैं। खालिस बंगला शैली में सादगी से होती चली आ रही यह दुर्गापूजा अपनी विशिष्टता को बरकरार रखे हुए है। लगभग ढाई सौ साल पूर्व कोलकाता से यहां आकर बसे मित्र परिवार ने इसकी शुरूआत की।
सन् 1960 में बंगाल के जमींदार आनंदमय मित्र कोलकाता के कुम्हार टोली से काशी आये थे। तब उन्होंने चौखम्भा के बंगाली ड्योढ़ी को अपना आशियाना बनाया था। 1773 में उन्होंने दुर्गापूजा [Ancient Durga Pooja] की शुरूआत की। इसके लिए कुम्हार टोली के कारीगर ने मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार की थी। मां दुर्गा के साथ ही कारीगर ने लक्ष्मी, सरस्वती, गणेश, कार्तिकेय, राम-शिव तथा शिवलिंग भी बनाया। सभी प्रतिमाएं 18वीं सदी के फ्रांस निर्मित चांदी के सिंहासन पर स्थापित की जाती है।
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Ancient Durga Pooja: चांदी के सिंहासन पर नौ खंड में विराजते हैं सभी देवी-देवता
इस चांदी के सिंहासन पर कुल नौ खंड हैं जिसमें सभी देवी-देवताओं को स्थान दिया गया [Ancient Durga Pooja] है। इसमें गृहदेवता, शालिग्राम, वाणेश्वर भगवान की पत्थर की मूर्तियां हैं। यहां पर मां दुर्गा की प्रतिमा मात्र चार फीट की है। जबकि अन्य प्रतिमाएं डेढ़-डेढ़ फीट की है। पहले दुर्गा व लक्ष्मी की प्रतिमा के लिए सोने का पत्तर व सरस्वती की प्रतिमा के लिए चांदी का पत्तर जर्मनी से आता था।
पहले बंगाली ड्योढ़ी में 15 दिनों तक दुर्गापूजा चलती थी। यहां पर थियेटर व गाना भी होता था जो बाद में बंद हो गया। अब यहां पांच दिवसीय दुर्गा पूजा हो गई है। खास बात यह है कि यहां पर पालकी में विराजित कर मां दुर्गा की प्रतिमा विसर्जन के लिए ले जाते हैं। यहां पर पूजा बंगला पद्धति से की जाती है।