Varanasi: चैत्र नवरात्र के तीसरे दिन शनिवार को मां भद्रकाली मंदिर सरावा में आस्था का सैलाब उमड़ पड़ा। सुबह से ही दूर-दराज क्षेत्रों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने मां के दरबार में विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर सुख-समृद्धि और परिवार की खुशहाली की कामना की। मंदिर परिसर में दिनभर दर्शन के लिए लंबी कतारें लगी रहीं और भक्तों के जयकारों से पूरा वातावरण भक्तिमय बना रहा।


वाराणसी जिला मुख्यालय से लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित सरावा गांव, जो तीन जिलों—वाराणसी, (Varanasi) भदोही और जौनपुर—की सीमा से घिरा है, वहां बसुही नदी के तट पर स्थित यह प्राचीन मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केंद्र माना जाता है। नवरात्र के अवसर पर यहां श्रद्धालुओं की संख्या में विशेष रूप से वृद्धि देखी जा रही है।

मंदिर के महंत दिनेश कुमार ने बताया कि इस मंदिर से जुड़ी एक प्राचीन मान्यता है। उनके अनुसार यहां के तत्कालीन राजा भद्रसेन मां भद्रकाली के परम भक्त थे और प्रतिदिन मां की आराधना करते थे। विशेष रूप (Varanasi) से शनिवार के दिन वे अपनी भक्ति के प्रतीक स्वरूप अपना शीश मां को अर्पित कर देते थे, जिससे प्रसन्न होकर मां उन्हें पुनः जीवित कर देती थीं और सोने का दान प्रदान करती थीं।

Varanasi: मंदिर से जुड़ी यह है मान्यता
कथा के अनुसार, मध्य प्रदेश के उज्जैन के प्रसिद्ध राजा राजा विक्रमादित्य भी एक श्राप से मुक्ति पाने के लिए काशी आए थे और राजा भद्रसेन के यहां सेवा करते थे। उन्होंने छिपकर राजा भद्रसेन की पूजा-पद्धति देखी और एक दिन स्वयं भी उसी प्रकार मां की कठोर साधना करते हुए अपना शीश अर्पित कर दिया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर मां भद्रकाली ने उन्हें भी पुनर्जीवित कर दिया।

मान्यता है कि राजा विक्रमादित्य ने मां से तीन वरदान मांगे थे—ब्राह्मण के श्राप से मुक्ति, मां का उज्जैन में निवास करना और भद्रसेन के बुलाने पर मां का प्रकट न होना। हालांकि मां ने इन वरदानों को पूर्ण रूप से स्वीकार नहीं किया, लेकिन वे सीमित समय के लिए उज्जैन गईं और 24 घंटे तक वहां निवास किया।


शनिवार की इस विशेष मान्यता के कारण यहां अन्य दिनों की तुलना में श्रद्धालुओं की संख्या अधिक रहती है। नवरात्र के अवसर पर आस्था अपने चरम पर दिखाई दे रही है। श्रद्धालुओं (Varanasi) की सुविधा और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए स्थानीय स्तर पर आवश्यक व्यवस्थाएं की गई हैं, जिससे दर्शन-पूजन का क्रम पूरे दिन सुचारु रूप से चलता रहा।

