राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने मुंबई में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान संघ की कार्यप्रणाली और अपने पद को लेकर अहम बातें कहीं। उन्होंने स्पष्ट किया कि आरएसएस में सरसंघचालक बनने के लिए जाति कोई मापदंड नहीं है। ब्राह्मण, क्षत्रिय या किसी भी जाति का होना जरूरी नहीं, केवल शर्त यह है कि व्यक्ति हिंदू हो।
जाति नहीं, विचार और प्रतिबद्धता आधार
मोहन भागवत (RSS) ने कहा कि संघ में पदों का निर्धारण जाति के आधार पर नहीं किया जाता। संघ के लिए व्यक्ति का विचार, जीवनशैली और संगठन के प्रति समर्पण ही सबसे बड़ा मानदंड होता है। उन्होंने दोहराया कि सरसंघचालक किसी एक समाज का प्रतिनिधि नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए कार्य करता है।
75 वर्ष की उम्र और पद को लेकर स्पष्टता
अपने पद को लेकर उन्होंने कहा कि सामान्यतः संघ (RSS) में यह मान्यता है कि 75 वर्ष की उम्र के बाद बिना औपचारिक जिम्मेदारी के काम करना चाहिए। उन्होंने बताया कि अपनी उम्र पूरी होने की जानकारी उन्होंने संगठन को दी थी, लेकिन संघ ने उनसे काम जारी रखने को कहा।भागवत ने साफ किया कि आरएसएस (RSS) में पद छोड़ने या बनाए रखने का फैसला व्यक्ति स्वयं नहीं करता, बल्कि संगठन करता है। उन्होंने कहा कि संघ में किसी पद के लिए चुनाव नहीं होता, बल्कि क्षेत्र और प्रांत के वरिष्ठ कार्यकर्ता मिलकर निर्णय लेते हैं।
भागवत ने कहा कि संघ (RSS) में सेवा आजीवन चलती है। भले ही कोई जिम्मेदारी से मुक्त हो जाए, लेकिन संघ का कार्य जीवन भर जारी रहता है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ के इतिहास में कभी किसी को जबरन रिटायर नहीं किया गया।
RSS: प्रचार नहीं, संस्कार देना उद्देश्य
आरएसएस प्रमुख ने कहा कि संघ का उद्देश्य प्रचार करना नहीं, बल्कि समाज में संस्कार देना है। जरूरत से ज्यादा प्रचार अहंकार को जन्म देता है, इसलिए संघ अपने कार्यों का दिखावा नहीं करता।
भाषा को लेकर भी टिप्पणी
भागवत ने कहा कि संघ के कार्यों में अंग्रेजी मुख्य भाषा नहीं है, क्योंकि यह भारतीय भाषा नहीं है। हालांकि जहां आवश्यकता होती है, वहां अंग्रेजी के प्रयोग से कोई परहेज नहीं है। उन्होंने मातृभाषा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि भाषा संवाद का माध्यम है, पहचान नहीं खोनी चाहिए।

