Varanasi: शहर की पहचान केवल उसके घाटों और गंगा की लहरों से नहीं है, बल्कि यहां की आत्मा शिक्षा और संस्कृति की धड़कनों से भी जीवित रहती है। बसंत पंचमी के अवसर पर सर्वविद्या की राजधानी काशी के सुंदरपुर स्थित उर्मिला देवी मेमोरियल सोसायटी की पाठशाला से जो दृश्य सामने आया, उसने हर किसी को हैरान कर दिया। वे मासूम बच्चे, जो कभी घाटों पर भीख मांगते दिखाई देते थे, अब किताब और कलम थामे मां सरस्वती की वंदना कर रहे थे। इन मुस्लिम बच्चों ने मजहब की दीवारों को फांदकर भविष्य को आगे बढ़ाया है।

मां सरस्वती को अर्पित किए पीले पुष्प
संस्था की निदेशिका और समाजसेवी प्रतिभा सिंह ने इन बच्चों के जीवन की दिशा बदल दी है। खास बात यह रही कि इनमें से अधिकतर बच्चे मुस्लिम समुदाय (Varanasi) से आते हैं, लेकिन बसंत पंचमी पर उन्होंने हिन्दू बच्चों के साथ मिलकर संस्कृत श्लोक “या कुंदेंदु तुषार हार धवला” का सस्वर पाठ किया, मां सरस्वती को पीले पुष्प अर्पित किए और हवन के साथ धूप-बत्ती से आरती भी की। यह दृश्य केवल धार्मिक सह-अस्तित्व का प्रतीक नहीं था, बल्कि शिक्षा की उस शक्ति का प्रमाण था जो मजहब की दीवारों को तोड़ देती है।

Varanasi: कटोरे में नहीं, किताब में होगा भविष्य
प्रतिभा सिंह बताती हैं कि यहां बच्चों को हिंदी, अंग्रेजी, गणित, विज्ञान और कला के साथ-साथ वेदों का अध्ययन भी कराया जाता है। उनके अनुसार शिक्षा ही असली धर्म है, जो हर बच्चे को समान अवसर देती है। दशकों पहले (Varanasi) जब उन्होंने ठंड में गरीब बस्ती के बच्चों को देखा, तो यह संकल्प लिया कि उनका भविष्य कटोरे में नहीं, किताब में होगा। उसी संकल्प से इस पाठशाला की नींव पड़ी, जो उनकी मां उर्मिला देवी के नाम से आज शिक्षा का दीप जला रही है।
आज यह पाठशाला (Varanasi) उन बच्चों के जीवन में नई रोशनी बन चुकी है। समाज के सहयोग से चितईपुर के पास एक बाल भवन का निर्माण भी हो रहा है, जहां आधुनिक सुविधाओं के साथ ज्ञान की गंगा बहेगी। बसंत पंचमी का यह आयोजन केवल पर्व नहीं रहा, बल्कि यह संदेश बन गया कि जब शिक्षा हाथ थाम लेती है, तो मजहब की दीवारें ढह जाती हैं और भविष्य रोशन हो उठता है।

