ISRO ने शुक्रवार को चंद्रयान-3 सफलतापूर्वक लांच कर दिया। ये ISRO की अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि बताई जा रही है। ये उपलब्धि इसलिए भी बड़ी बताई जा रही है, क्योंकि अभी तक अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश इसकी तैयारी कर रहे थे, वहीं भारत ने चंद्रयान-3 लांच कर दिया। इसरो (ISRO) की इस कामयाबी पर पूरा देश गर्व महसूस कर रहा है।
जिस इसरो (ISRO) पर भारत का हर नागरिक आज गर्व महसूस कर रहा है, उसके इतिहास को जानकर शायद आपको हैरानी होगी। इसरो (ISRO) ने बेहद कम समय में उन्नति के शिखर को छुआ है। इसके इतिहास को जानने के लिए हमें लगभग 54 वर्ष पीछे जाना होगा। वैसे इसरो (ISRO) की स्थापना भारतीय वैज्ञानिक डॉ० विक्रम साराभाई ने 15 अगस्त 1969 को की थी। लेकिन इससे पहले भारत 21 नवम्बर, 1963 को अपना राकेट लांच कर चुका था।
आश्चर्य की बात यह है कि भारत के पहले राकेट को साइकिल और बैलगाड़ी पर लड़कर प्रक्षेपण के लिए ले जाया गया था। जी हां, वैज्ञानिक पहले राकेट को साइकिल पर लड़कर प्रक्षेपण के लिए ले गए। वहीं इस मिशन का दूसरा राकेट काफी बड़ा और भारी था। जिसे बैलगाड़ी के सहारे प्रक्षेपण स्थल पर ले जाया गया था। इससे भी ज्यादा आश्चर्यजनक बात यह है कि भारत ने पहले राकेट के लांच के लिए नारियल के पेड़ों को लॉन्चिंग पैड बनाया गया था। वर्तमान में पूरे भारत में इसरो (ISRO) के 13 सेंटर हैं।
भारत में पहले अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत वर्ष 1963 में हुई थी। उस समय भारत के पास पर्याप्त संसाधन नहीं थे। बावजूद इसके भारतीय अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने वह कर दिखाया, जो उस दौर में दूसरे देश सोच नहीं सकते थे। वर्ष 1963 में भारत द्वारा ”नाईक अपाचे“‘ नाम के पहले राकेट को केरल की राजधानी त्रिवेंद्रम के पास मछुआरोन के एक गांव थुंबा से 21 नवम्बर को लांच किया गया। इस राकेट को लॉन्चिंग स्टेशन तक साइकिल पर लादकर ले जाया गया था। उस समय भारत में अंतरिक्ष कार्यक्रम से जुड़े वैज्ञानिकों के पास अपना कार्यालय तक नहीं था।

उस समय भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम के प्रमुख वैज्ञानिक केरल राज्य के तिरुवनंतपुरम स्थित एक चर्च में बैठक किया करते था। इसी बैठक में अंतरिक्ष संबंधी सभी कार्यक्रमों पर चर्चा की जाती थी। एक तरह से देखगा जाय तो यही चर्च उस समय भारतीय अन्तरिक्ष वैज्ञानिकों का कार्यालय हुआ करता था। उस समय इस चर्च का नाम सेंट मैरी मैगडेलीन था, इसे आज अंतरिक्ष संग्रहालय का रूप दिया गया है।

भारत में पहले रॉकेट प्रक्षेपण कार्यक्रम की शुरुआत 21 नवंबर 1963 को केरल के तिरुवंतपुरम के समीप थुंबा से हुई। उस समय देश के पास बहुत ही सीमित आधारभूत संरचना थी। भारतीय वैज्ञानिकों ने राकेट को भू कक्षा में स्थापित करने के लिए थुंबा से बेहतर जगह नहीं हो सकती थी। इसके लिए तैयारियां भी 1962 में ही शुरू हो गईं। सबसे पहले एक चर्च का अधिग्रहण किया गया और बगल की खेत में रॉकेट लॉन्चर स्थापित किया गया।
उस समय भारत के पास अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए कोई कार्यालय भी नहीं था। इसी चर्च में कार्यालय स्थापित हुआ था। वहीं भी विशप के घर को निदेशक का ऑफिस बनाया गया। सेंट मैरी मैगडेलीन चर्च को इमारत का कंट्रोल रूम बनाया गया। यहां तक कि राकेट के कलपुर्जे और अंतरिक्ष उपकरणों को प्रक्षेपण स्थल पर बैलगाड़ी और साइकिल से ले जाया गया था।
कैसी हुई इसरो (ISRO) की स्थापना
अंतरिक्ष कार्यक्रम पर अनुसंधान के लिए 1 जनवरी 1965 को थुंबा में एक अंतरिक्ष विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी केंद्र की स्थापना हुई। इसके बाद जनवरी 1967 में अहमदाबाद में सेटेलाइट टेलीकम्युनिकेशन अर्थ स्टेशन बनाया गया। इसी के अगले साल 1968 में अहमदाबाद में ही एक्सपेरिमेंटल सेटेलाइट कम्युनिकेशन अर्थ स्टेशन का भी गठन हुआ और फिर 1969 में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन इसरो (ISRO) अस्तित्व में आया। यहीं से भारतीय अंतरिक्ष कार्यक्रम में अपनी गति पकड़ी।


