Stampede History: प्रयागराज में हुई दर्दनाक घटना ने देशभर के लोगों को चिंतित कर दिया है। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री ने इस घटना पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए घायलों के लिए तत्काल चिकित्सा सहायता देने का निर्देश दिया है। इस घटना के बाद प्रयागराज और काशी में सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
बुधवार को मौनी अमावस्या के अवसर पर उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में संगम क्षेत्र में एक भयंकर भगदड़ मच गई। इस घटना में 30 लोगों की मौत हो गई, जबकि 60 से अधिक लोग घायल हो गए। घायलों को उपचार के लिए पास के अस्पतालों में भर्ती कराया गया है। घटना के बाद, अखाड़ों के शाही स्नान को कुछ समय के लिए रोक दिया गया था, लेकिन बाद में इसे फिर से शुरू किया गया।
कुंभ मेला, जो विश्व का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन माना जाता है, इतिहास में कई बार भगदड़ की घटनाओं का साक्षी रहा है। ऐसी घटनाएं हमेशा से ही सुरक्षा और भीड़ नियंत्रण की खामियों को उजागर करती रही हैं।

Stampede History: 2013 में इलाहाबाद स्टेशन पर भगदड़:
उत्तर प्रदेश के कुंभ मेले में 10 फरवरी 2013 को इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर एक फुटब्रिज के ढहने से भगदड़ मच गई थी। इस हादसे में 42 लोगों की मौत हो गई और 45 लोग घायल हुए थे। इसके बाद, साल 2025 में महाकुंभ के संगम क्षेत्र में भी भगदड़ जैसे हालात पैदा हो गए, जिससे कई लोग घायल हुए थे।
1986 में हुई एक और बड़ी भगदड़:
1986 में भी कुंभ मेले में एक भगदड़ मच गई थी, जिसमें लगभग 200 लोगों की जान चली गई थी। यह घटना तब हुई थी जब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह और कई अन्य प्रमुख नेता हरिद्वार पहुंचे थे। इस दौरान सुरक्षाकर्मियों ने आम श्रद्धालुओं को नदी के किनारे जाने से रोक दिया, जिसके बाद भीड़ बेकाबू हो गई और भगदड़ मच गई।

1954 में प्रयागराज कुंभ मेला:
3 फरवरी 1954 को प्रयागराज में हुए कुंभ मेले में लाखों श्रद्धालु मौनी अमावस्या के स्नान के लिए पहुंचे थे। अचानक कुछ अफवाहें फैलने के कारण भगदड़ मच गई, जिसमें करीब 800 श्रद्धालु अपनी जान से हाथ धो बैठे थे। उस समय भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी इस आयोजन में शामिल हुए थे।
1954 का कुंभ मेला और राजनीतिक संदर्भ:
1954 का कुंभ मेला भारत की स्वतंत्रता के बाद का पहला बड़ा आयोजन था, जहां कई प्रमुख नेता भी उपस्थित थे। इस दौरान, सुरक्षा उपायों की विफलता और नेताओं की भारी संख्या ने भगदड़ को जन्म दिया। यह घटना बाद में चर्चित लेखक विक्रम सेठ के उपन्यास ‘ए सूटेबल बॉय’ में भी दर्ज की गई थी, जिसमें इसे “पुल मेला” कहा गया।
Highlights
2003 में नासिक में भी भगदड़:
इसी तरह की एक त्रासदी 2003 में मुंबई के नासिक में भी हुई थी। उस समय गोदावरी नदी में पवित्र स्नान के दौरान भगदड़ मच गई, जिसमें 39 लोगों की मौत हो गई और 100 से अधिक लोग घायल हो गए। यह घटना भी कुंभ मेले के दौरान हुई थी और श्रद्धालुओं की भारी भीड़ के कारण हुई थी।

