केंद्रीय कैबिनेट ने बहुप्रतीक्षित ‘एक देश, एक चुनाव‘ प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इस बिल को संसद के मौजूदा शीतकालीन सत्र में पेश किए जाने की तैयारी है। सरकार सभी राजनीतिक दलों के सुझाव लेकर इसे संसद से पास कराने की योजना बना रही है। इससे पहले, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी थी, जिसमें इस प्रस्ताव से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर सुझाव दिए गए थे।
क्या है ‘एक देश, एक चुनाव’ का प्रस्ताव?
‘एक देश, एक चुनाव’ का उद्देश्य भारत में लोकसभा और सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ कराना है।
- यह विचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लंबे समय से उठाते रहे हैं।
- उनका मानना है कि लगातार चुनाव कराने से प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव बढ़ता है और खर्च में भी अत्यधिक वृद्धि होती है।
- यदि चुनाव एक साथ हों, तो सरकारें विकास कार्यों पर अधिक ध्यान केंद्रित कर सकती हैं।
समिति की प्रमुख सिफारिशें
- पहले चरण में लोकसभा और राज्य विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाएं।
- इन चुनावों के 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकाय चुनाव संपन्न हों।
- प्रस्तावित योजना को लागू करने के लिए संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता होगी।
‘एक देश, एक चुनाव’ क्यों है जरूरी?
सरकार का मानना है कि यह प्रणाली कई स्तरों पर फायदेमंद साबित हो सकती है:
- चुनाव खर्च में कमी: बार-बार चुनाव कराने पर करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, जो बचाए जा सकते हैं।
- राजनीतिक स्थिरता: लगातार चुनाव से नीतिगत निर्णय प्रभावित होते हैं। यह प्रक्रिया स्थिरता लाएगी।
- प्रशासन पर दबाव कम: अधिकारियों का समय और ऊर्जा बचने से प्रशासनिक कार्यों में तेजी आएगी।
- विकास पर जोर: सरकारें चुनावी मोड में रहने के बजाय विकास परियोजनाओं पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी।
- आर्थिक लाभ: सरकारी खजाने पर बोझ कम होगा, जिससे आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा।
Highlights
भारत में पहले भी लागू हो चुका है यह मॉडल
‘एक देश, एक चुनाव’ भारत के लिए नया नहीं है। 1952 से 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ होते थे। लेकिन राज्यों के पुनर्गठन और अन्य कारणों से यह परंपरा टूट गई।