- राधेश्याम कमल
Ramkrishna Mission: वाराणसी में रामकृष्ण अद्वैत आश्रम लक्सा में आज से 115 साल पहले 1908 में सर्वप्रथम दुर्गा पूजा की शुरुआत हुई थी। रामकृष्ण संघ के प्रथम अध्यक्ष स्वामी ब्रह्मानंदजी ने पुलीन बाबू के विशेष आग्रह पर सार्वजनिक तौर पर प्रथम दुर्गा पूजा की। तब से यह दुर्गापूजा निरंतर होती चली आ रही है। यहां पर पूरी तरह से शास्त्रीय विधि से पूजा होती है।
शरद ऋतु के आरंभ होते ही, तुहीन कणों पर ओस की निस्तब्धता व निर्निमेषता को देख हर काशीवासी के हृदय में अद्वैत आश्रम [Ramkrishna Mission] में संध्या आरती के पश्चात गाये जाने वाले देवी पक्ष की आगमनी गान व ढाक की मधुर थाप गूंजायमान होने लगती है। पुष्पांजलि की वर्षा, धनुची नृत्य, मां की विहंगम आरती प्राण संचार करती बंगीय पद्धति की पूजा, चंडी के मंत्रोच्चार व ढाकेश्वरी सज्जा में मां की सजी प्रतिमा किसी के भी अर्न्तमन में प्रतिबिम्बित होने लगती है।
इसी कल्पना को मूर्त रूप देते हुए 115वें वर्ष में लक्सा स्थित रामकृष्ण अद्वैत आश्रम [Ramkrishna Mission] में 20 अक्टूबर से शारदीय दुर्गाेत्सव की शुरूआत होने जा रही है। यह पूजा 24 अक्टूबर तक चलेगी। 20 षष्ठी को कल्पारंभ व षष्ठी विहित पूजा, 21 को महासप्तमी पूजा, 22 को अष्टमी पूजा, सायंकाल संधि पूजा 23 को महानवमी पूजा तथा 24 को दशमी पूजा होगी। मां की प्रतिमा का विसर्जन लक्ष्मीकुंड पोखरे में किया जायेगा।
Highlights
Ramkrishna Mission: शिव की नगरी में यह है अनूठी दुर्गा पूजा
शिव की नगरी में रामकृष्ण अद्वैत आश्रम की दुर्गा पूजा एकदम अलग व अनूठी है।रामकृष्ण मिशन के मुख्यालय बेलूड मठ के बाद यदि किसी शाखा केन्द्र की दुर्गा पूजा पूजा सबसे प्राचीन व पारम्परिक मानी जाती है तो वह रामकृष्ण अद्वैत आश्रम की है। यहां पर पूरी निष्ठा व शास्त्रीय परम्परा का पालन करते हुए पूजा होती है।यहां पर भक्त एक चुबंकीय आकर्षण का अनुभव करते हैं।
विवेकानंद मां शारदा को कहते थे ‘जीवंत दुर्गा’
स्वामी विवेकानंद सदैव मां शारदा को जीवंत दुर्गा कहा करते थे। उनकी चिन्मयी मां का सन् 1912 में काशी प्रवास हुआ। एक दिन उन्होंने स्वयं श्री ठाकुरजी की के पार्श्व में अपनी छवि स्थापित कर पूजा की। 1913 में ठाकुर के भक्त नवगोपाल घोष की धर्मपत्नी निस्तारिणी देवी के विशेष प्रार्थना पर स्वामी ब्रह्मानंद ने काशी में स्वयं उपस्थित होकर प्रतिमा में दुर्गा पूजा करने की व्यवस्था की। तब से आज तक अनवरत रूप में चिन्मयी मां द्वारा स्थापित स्थान में मृन्मयी मां की पूजा हो रही है।
आज तक प्रतिमा में कोई बदलाव नहीं हुआ
पूजा के आरंभ से लेकर आज तक दुर्गा की प्रतिमा में कोई बदलाव नहीं किया गया। एक ही आकार व रूप में मां दर्शन देती हैं। कोरोना महामारी में भी प्रतिमा की ऊंचाई सभी जगह कम कर दी गई थी किंतु काशी अद्वैत आश्रम इसका अपवाद रहा। 1913 के बाद अनवरत यहां प्रतिमा पूजा होती रही। यहां पर पारम्पिरक एक चाला की प्रतिमा स्थापित की जाती है। संघ के एक प्रवीण सन्यासी ने स्वयं का मां का सांचा बनाया था। उसी सांचे के अनुरूप हर साल मां की प्रतिमा बनायी जाती है। इस साल शिल्पकार अभिजीत विश्वास ने मां दुर्गा को अंतिम स्वरूप दिया है। पहले उनके पिता चीनू विश्वास यहां की प्रतिमा बनाया करते थे।
संध्या आरती व कुंवारी पूजन का होता है विशेष आकर्षण
दुर्गा पूजा के दौरान काली कीर्तन करने की परम्परा यही पर विकसित हुई। आज भी रामकृष्ण संघ में काली कीर्तन के तीन लोकप्रिय घरानों में काशी की एक अलग पहचान है। सेवाश्रम के साधु हर वर्ष पूजा से पहले काली कीर्तन का अभ्यास करते हैं। जब मंडप में संध्या आरती के पश्चात सामूहिक काली कीर्तन किया जाता है तो पूरा वातावरण मंत्रमुग्ध करने वाला होता है। यहां पर कुंवारी कन्याओं का पूजन देखने योग्य होता है। 22 अक्टूबर अष्टमी तिथि पर कुंवारी कन्या का पूजन होगा। देवी के रूप में बालिका को सजाया जाता है।