Varanasi: ललिता घाट पर कुत्ते नोच रहे हैं मृत जानवरों के शव, वहीं कुछ कदम दूर लोग उसी जल में शैम्पू और साबुन से स्नान कर रहे हैं। लाल घाट, गोला घाट और पंचगंगा घाट पर बहते जानवरों के शव, गिरता सीवर —ये दृश्य किसी आम नदी के नहीं, बल्कि मां गंगा के हैं, जिनकी सफाई पर बीते एक दशक में अरबों रुपये खर्च हो चुके हैं। गंगा की निर्मलता के दावों के बीच हकीकत कितनी भयावह हो चुकी है।
सामनेघाट से आदिकेशव घाट के बीच कई घाटों पर गंगा में सीवर का गिरना बंद नहीं हुआ है। आदिकेशव और सामनेघाट पर जानवरों को नहलाने का सिलसिला तो अनवरत जारी है। ललिता घाट पर बहकर आए मरे जानवरों को कुत्ते नोचते मिले।
Varanasi: गंगा सफाई और विकास पर करोड़ों-अरबों रुपये खर्च
गौर करने वाली बात यह है कि ये हालात उस शहर (Varanasi) के हैं जिसके सांसद खुद देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं। 2014 से अब तक गंगा सफाई और वाराणसी के विकास के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपये के फंड की खबरें अखबारों में छपती रही हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या इस बदहाल स्थिति की जवाबदेही प्रधानमंत्री, स्थानीय प्रशासन और जिम्मेदार अधिकारियों की नहीं बनती? यह सिर्फ पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि आस्था, प्रशासनिक जवाबदेही और जनस्वास्थ्य का गंभीर मामला है।

