Varanasi: ज्ञान, विद्या और कला की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती के पावन पर्व बसंत पंचमी को लेकर शिव की नगरी काशी पूरी तरह उत्सव के रंग में रंग चुकी है। शुक्रवार को मनाए जाने वाले इस पर्व के लिए शहर भर में तैयारियां अपने अंतिम चरण में हैं। गली-मोहल्लों से लेकर मूर्तिकारों की कार्यशालाओं तक रौनक देखते ही बन रही है। हर ओर मां सरस्वती की प्रतिमाओं को अंतिम रूप देने का काम तेज़ी से पूरा किया जा रहा है।
मूर्तियों में सजी श्रद्धा और कला
मूर्तिकारों द्वारा प्रतिमाओं का रंग-रोगन, वस्त्र, आभूषण और वीणा की सजावट पूरे मनोयोग से की जा रही है। कार्यशालाओं में सुबह से देर रात तक चहल-पहल बनी हुई है। मूर्तिकारों का कहना है कि वे पिछले करीब एक महीने से लगातार इस कार्य में जुटे हुए हैं। प्रतिमा निर्माण (Varanasi) में पूरा परिवार सहयोग करता है—कोई मिट्टी गढ़ता है, तो कोई रंग भरता है और कोई सजावट की जिम्मेदारी संभालता है।
Varanasi: पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा
एक मूर्तिकार ने बताया कि हर वर्ष उनके यहां 40 से 50 मां सरस्वती की प्रतिमाएं तैयार की जाती हैं, जिन्हें स्कूलों, कॉलेजों, सामाजिक संस्थाओं और पूजा समितियों द्वारा खरीदा जाता है। काशी महादेव की नगरी है, इसलिए यहां की परंपरा के अनुसार सबसे पहले भगवान शिव की मूर्ति का निर्माण किया जाता है। इसके बाद ही मां सरस्वती की प्रतिमाओं को आकार दिया जाता है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसे आज भी पूरी श्रद्धा के साथ निभाया जा रहा है।
नारी सशक्तिकरण की झलक
इस वर्ष मां सरस्वती की प्रतिमाओं में एक खास संदेश भी देखने को मिल रहा है। मूर्तिकारों ने बताया कि इस बार प्रतिमाओं की थीम नारी सशक्तिकरण (Varanasi) पर आधारित है। मां सरस्वती को आत्मविश्वास, ज्ञान और शक्ति के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। प्रतिमाओं के मुखमंडल, हाव-भाव और रंगों में यह संदेश स्पष्ट रूप से झलकता है, जो समाज को सकारात्मक दिशा देने का प्रयास है।
बसंत पंचमी के अवसर पर काशी में इन आकर्षक और भावपूर्ण प्रतिमाओं को देखने और खरीदने के लिए श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ने की उम्मीद है। पूजा पंडाल (Varanasi) सज चुके हैं और शहर में भक्तिमय माहौल बन गया है। ज्ञान और संस्कृति की इस परंपरा को जीवंत बनाए रखने में काशी के मूर्तिकारों की मेहनत और कला एक बार फिर लोगों का मन मोह रही है।

