अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) की तिथि भले ही रविवार दोपहर से आरंभ हो गई थी, लेकिन उदया तिथि के मान के कारण इसका मुख्य उत्सव सोमवार को मनाया गया। इस खगोलीय गणना ने ही काशी की धार्मिक धड़कनों को आज के दिन केंद्रित किया। हालांकि, कई श्रद्धालुओं ने तिथि लगते ही बटुकों का उपनयन संस्कार, पूजन-अर्चन और खरीदारी शुरू कर दी थी। इस बार का संयोग विशेष रहा, जब पूरे दस वर्षों बाद नौ योग और पांच शुभ मुहूर्त एक साथ बने, जिससे अक्षय फल की मान्यता और भी प्रबल हो गई।

गंगा घाटों पर उमड़ा आस्था का सैलाब
सुबह की पहली किरण के साथ ही काशी के गंगा घाट श्रद्धालुओं से पट गए। हर ओर श्रद्धा और विश्वास की लहरें दिखीं, जहां लोग गंगा स्नान कर पुण्य अर्जित करने में जुटे रहे। स्नान के बाद तीर्थ (Akshaya Tritiya) पुरोहितों को दान-दक्षिणा देकर श्रद्धालुओं ने अक्षय फल की कामना की। चांदी, दूध, चावल, शंख, सफेद मोती, गेहूं, इत्र, रेशमी वस्त्र, मसूर और चने की दाल, हल्दी जैसे वस्त्र और अन्न का दान इस विश्वास के साथ किया गया कि यह पुण्य कभी क्षीण नहीं होगा।
बाजारों में शुभ मुहूर्त की चहल-पहल
धार्मिक (Akshaya Tritiya) आस्था के साथ-साथ बाजारों में भी उत्साह चरम पर रहा। सुबह, दोपहर और शाम के शुभ मुहूर्तों के अनुसार खरीदारी का सिलसिला चलता रहा। सोना-चांदी, कामधेनु गाय की मूर्ति, तांबे के बर्तन, लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमाएं, यंत्र, धनिया, नमक और यहां तक कि वाहन तक खरीदे गए। कई लोगों ने इस शुभ दिन को नए व्यापार या निवेश की शुरुआत के लिए भी चुना, ताकि समृद्धि का यह चक्र अक्षय बना रहे।
नौ योग और रोहिणी नक्षत्र का दुर्लभ संयोग
ज्योतिषीय दृष्टि से इस बार अक्षय तृतीया का महत्व कई गुना बढ़ गया। सौभाग्य, आयुष्मान, धृति, स्थिर, त्रिपुष्कर, राजयोग, मालव्य और शुभ जैसे नौ योगों के साथ यह तिथि आई। रोहिणी नक्षत्र की उपस्थिति ने इसे और विशेष बना दिया। सूर्य और चंद्रमा दोनों अपने उच्च राशि में रहे, जिससे अक्षय योग का निर्माण हुआ। श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर न्यास के पूर्व अध्यक्ष प्रो. नागेंद्र पांडेय के अनुसार तिथि रविवार दोपहर 1:01 बजे प्रारंभ होकर सोमवार सुबह 10:39 बजे तक रही, जिससे पूरे दिन शुभ कार्यों की अनुकूलता बनी रही।
धर्मसंघ में 1100 बटुकों का वैदिक संस्कार
अक्षय तृतीया (Akshaya Tritiya) के पावन अवसर पर धर्मसंघ शिक्षा मंडल, दुर्गाकुंड में 1100 बटुकों का यज्ञोपवीत संस्कार संपन्न हुआ। इस भव्य आयोजन में पूर्वांचल के साथ-साथ देश के आठ राज्यों से आए बटुकों ने भाग लिया। धर्मसंघ के महामंत्री पंडित जगजीतन पांडेय के अनुसार 100 से अधिक वेदियों का निर्माण किया गया था और सुबह सात बजे से अनुष्ठान प्रारंभ हुआ। इस दौरान बटुकों को संगीत शिक्षा की भी शुरुआत कराई गई, जो उनके वैदिक जीवन की नई दिशा का संकेत बनी।
Akshaya Tritiya: परंपरा हुई सजीव
अस्सी स्थित (Akshaya Tritiya) दक्षिणामूर्ति मठ में भी शंकराचार्य स्वामी निश्चलानंद के सानिध्य में विशेष अनुष्ठान आयोजित हुए। वैदिक मंत्रोच्चार और धार्मिक विधानों के बीच परंपरा की जीवंतता स्पष्ट दिखाई दी। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति की निरंतरता का सशक्त प्रतीक बनकर सामने आया।
इस प्रकार, अक्षय योग के इस अद्भुत संयोग में काशी ने एक बार फिर अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा और परंपराओं की समृद्धि का परिचय दिया, जहां आस्था, ज्योतिष और सामाजिक उत्सव एक साथ मिलकर अक्षय तृतीया को सचमुच अक्षय बना गए।

