Mahakumbh 2025: भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में कुंभ मेले ने एक अहम भूमिका निभाई। यह न केवल धार्मिक आयोजन था बल्कि क्रांतिकारियों और स्वतंत्रता सेनानियों के लिए गुप्त मुलाकातों और जनजागरण का केंद्र भी बना। प्रयागराज में तीर्थ पुरोहितों (प्रयागवाल) की निशान प्रथा के आधार पर क्रांतिकारी भी संदेशों और प्रतीकों का उपयोग करते थे, जिससे गुप्त रूप से साथियों को एकत्रित किया जाता था।
Mahakumbh 2025: 1857 की क्रांति और कुंभ का जुड़ाव
1857 की स्वतंत्रता संग्राम की योजना में प्रयागराज का एक विशेष स्थान था। माना जाता है कि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई क्रांति की योजना बनाने से पहले संगम नगरी आई थीं और यहां एक तीर्थ पुरोहित के घर रुकी थीं। ग्वालियर में अंग्रेजों से लड़ते हुए रानी लक्ष्मीबाई नागा साधुओं के प्रमुख आश्रम पहुँचीं, जहाँ बाबा गंगादास के नेतृत्व में 2,000 नागा साधुओं ने अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष किया। इस भीषण युद्ध में 745 साधु शहीद हुए।
प्रयागवालों का योगदान और बमबारी
1857 के जून महीने में, जब विद्रोह अपने चरम पर था, बड़ी संख्या में प्रयागवाल भी इस संघर्ष में शामिल हुए। इसके जवाब में कर्नल नील ने 15 जून 1857 को संगम क्षेत्र में बमबारी करवाई, जिसमें प्रयागवालों की बस्तियाँ और माघ मेला क्षेत्र प्रभावित हुए।
गांधीजी और कुंभ मेला
महात्मा गांधी ने भी कुंभ मेले को स्वतंत्रता आंदोलन के लिए एक मंच के रूप में उपयोग किया। 1918 में, अपने राजनीतिक गुरु गोपालकृष्ण गोखले की सलाह पर गांधीजी प्रयागराज कुंभ पहुंचे। उन्होंने संगम में स्नान किया और वहां लोगों से मुलाकात की। अंग्रेज खुफिया रिपोर्टों में इसका जिक्र किया गया, जिससे अंग्रेजों में कुंभ को लेकर सतर्कता बढ़ गई।
1918 के कुंभ में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए रेलवे ने टिकटों की बिक्री पर रोक लगा दी थी। इसके बावजूद लाखों लोग पहुंचे। 1930 में गांधीजी के नमक सत्याग्रह की तैयारी के चलते अंग्रेजों ने कुंभ को लेकर अतिरिक्त सावधानी बरती। 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान कुंभ का आयोजन आधिकारिक तौर पर नहीं किया गया। फिर भी लाखों श्रद्धालु बिना किसी निमंत्रण के पहुंचे।
महामना और वायसराय की चर्चा
1942 के कुंभ के दौरान वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो ने प्रयागराज का दौरा किया। कुंभ में लाखों लोगों की भीड़ देखकर उन्होंने महामना मदन मोहन मालवीय से पूछा कि इतने लोगों को बुलाने में कितना खर्च हुआ। मालवीयजी ने हंसते हुए कहा, “सिर्फ दो पैसे।” उन्होंने पंचांग दिखाते हुए समझाया कि इसके जरिए लोग कुंभ और स्नान पर्व की तारीखें जान जाते हैं और खुद-ब-खुद कुंभ में शामिल हो जाते हैं।
भूले-बिसरे शिविर की शुरुआत
1946 के माघ मेले में 18 वर्षीय राजाराम तिवारी ने एक नई पहल की। उन्होंने ‘भारत सेवा दल’ नामक संस्था बनाई, जो मेले में भटकने वाले लोगों को उनके परिजनों तक पहुंचाने का कार्य करती थी। यह सेवा उनकी मृत्यु (2016) तक जारी रही और अब उनके परिवारजन इस कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं।
Highlights
कुंभ मेला न केवल आस्था का केंद्र रहा, बल्कि देश के स्वतंत्रता आंदोलन में भी इसकी भूमिका ऐतिहासिक रही। यह मेलों के माध्यम से जन-जागरण और सामाजिक एकजुटता का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करता है।