- कमोवेश हर घर बीमार, कामकाज छोड़ (Health Administration) चिकित्सक, लैब और दवा दुकान का चक्कर
- नगर निगम को राजस्व बढ़ाने की चिंता, महामारी से बचाव की खातिर फॉगिंग तक नहीं
- स्वास्थ्य महकमा डेंगू की बात कह झाड़ रहा पल्ला, गिना रहे हैं जांच के कागजी आंकड़े
- कोरोना की लौटने की सुगबुगाहट के बीच एक साथ कई बीमारियों से जूझ रहे नागरिक
Story By : जितेंद्र श्रीवास्तव/राघवेंद्र केशरी/देवकुमार केसरी
वाराणसी। यह मुश्किल वक्त है! ‘हर शख्स परेशान है।’ ‘हर घर बेजार है।’ ‘मानसिक तनाव से हर परिवार जूझ रहा है।’ ‘आर्थिक चोट लग रही है तो जमा पूंजी टूट रही है।’ ‘कोरोना’, ‘डेंगू’, ‘चिकनगुनिया’, ‘टायफाइड’, ‘मलेरिया’, ‘रहस्यमय बुखार’ और न जाने क्या-क्या नाम…। एक साथ कई बीमारियों से यह जिला लड़ रहा है। कमोवेश हर घर बीमार है। परेशान है। चित्त और मन अशांत है। किसी काम में मन नहीं लग रहा। हर शख्स कामकाज छोड़ चिकित्सक, लैब और दवा की दुकान का चक्कर लगाने को विवश है। दवा की दुकानों पर ‘कोरोना काल’ का माहौल है। सरकारी अस्पताल फुल है तो प्राइवेट वालों की चांदी कट रही है।
Highlights
इसके बीच ‘अदृश्य महामारी’ (Health Administration) ने भी कहर बरपाना शुरू कर दिया है। यह ‘अदृश्य बीमारी’ क्या है, इसे स्वास्थ्य महकमा भी नहीं जानता। कोई इसे डेंगू बताता है तो कोई मलेरिया, कोई चिकनगुनिया कहता है तो कोई टायफाइड। इसके बीच तेजी से चर्चा चली है ‘स्क्रब टायफस’ की। भला यह कौन सी बीमारी है। इस बारे में कोई कुछ बताने को तैयार नहीं है। बावजूद इसके, यह तो कड़वी सच्चाई है कि समूचा जिला ‘अदृश्य महामारी’ के कहर की चपेट में हैं। देहात और शहर घुट-घुट कर जीने को विवश है। नगर निगम को सिर्फ और सिर्फ राजस्व बढ़ाने की चिंता है और स्वास्थ्य महकमा को जांच के आंकड़े गिनाने की फिक्र है।

नागरिकों का कहना है कि संक्रामक रोगों से निजात दिलाने की महती जिम्मेदारी स्वास्थ्य विभाग (Health Administration) के साथ-साथ नगर निगम की भी होती है। लेकिन दोनों महत्वपूर्ण विभाग अपनी-अपनी जिम्मेदारियां कितना निभा पा रहे हैं, यह किसी से छुपा नहीं है। फॉगिंग हो रही है या नहीं, यह बताने वाला कोई नहीं है। पहले 90 वार्ड थे। अब तो 10 वार्ड और बढ़ गए हैं। दायरा तो बढ़ता जा रहा है, लेकिन संसाधन नहीं के बराबर है।
सिर्फ दो-चार फॉगिंग मशीनों के सहारे करीब 33-34 लाख की आबादी को महामारी (Health Administration) से बचाने की बात करना बेमानी है। एंटी लार्वा दवा का छिड़काव कब हुआ है, यह तो ठीक से याद नहीं है। मिनी सदन के जनप्रतिनिधि बदलते हैं। नगर निगम के अधिकारी बदलते हैं। बदलाव के बाद आने वाले जनप्रतिनिधि और अधिकारी दावे तो बड़े-बड़े करते हैं। सब्जबाग दिखाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते हैं, लेकिन व्यवस्था जस की तस रहती है। हकीकत से सामना होने के बाद उनकी भी ‘हवा’ निकल जाती है।
नागरिकों का कहना है कि महकमा कोई भी हो, कुछ ‘घाघ’ किस्म के अधिकारी ऐन-केन-प्रकारेण ऐसी कुर्सी पर जमे रहते हैं, जहां से ‘एग्जाई’ जबदरस्त होती है और यहीं ‘घाघ’ अधिकारी नगर निगम की लुटिया डुबोते रहते हैं। नागरिकों का यहां तक कहना है कि हर बार बदलाव के बाद भी हालात जस के तस रहते हैं। सिर्फ कागजों पर फॉगिंग और दवा के छिड़काव का कोरम पूरा कर दिया जाता है।

यह अलग है कि कुछ चुनिंदा इलाकों, जहां अधिकारी और ‘माननीय’ रहते हैं, वहां फॉगिंग और दवा के छिड़काव की रस्म अदायगी कर दी जाती है। नगर निगम को राजस्व बढ़ाने की चिंता है, लेकिन महामारी से बचावे की खातिर फांगिंग की नहीं। स्वास्थ्य महकमा (Health Administration) भी डेंगू की बात कह पल्ला झाड़ ले रहा है और जांच के कागजी आंकड़ें गिना कर अपनी पीठ थपथपा रहा है। हालात यह है कि कोरोना की लौटने की सुगबुगाहट के बीच एक साथ कई बीमारियों से काशीवासी जूझ रहे हैं।
पूर्वांचल के एम्स कहे जाने वाले बीएचयू के सर सुंदरलाल अस्पताल (Health Administration) ही नहीं समस्त सरकारी अस्पतालों में प्लेटलेट्स न मिलने से मरीजों के इलाज पर संकट गहराने लगा है। सरकारी और प्राइवेट अस्पताल संक्रामक बीमारियों की चपेट में आए मरीजों से अटे-पटे हैं। शहर और देहात क्षेत्र में विभिन्न प्रकार की बीमारियों ने अपना डेरा जमा लिया है। इसके चलते दवाओं की दुकानों पर फिर सुबह से शाम तक उसी तरह भीड़ दिखने लगी है, जैसी कोरोना काल में दिखती रही।

सरकारी अस्पतालों (Health Administration) में जांच के नाम पर मरीजों को ‘ठेंगा’ दिखा दिया जा रहा है। जांच किट की अनुपलब्धता के चलते प्राइवेट लैब वालों के यहां मरीजों की भीड़ उमड़ रही है। डेंगू के मामले बढ़ने के बाद निजी लैबों में जांच के नाम पर मनमाना रेट लिया जा रहा है। कई लैब संचालक तो 1500 से 1800 रुपये वसूल रहे हैं। ऐसे कई मामले सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग निजी प्रयोगशालों पर लगाम नहीं कस पा रहा है।
नागरिकों का कहना है कि जिस प्रकार कोरोना काल में निजी लैब वालों के लिए जांच रेट फिक्स कर दिये गये हैं, ठीक उसी तर्ज पर मौजूदा समय में भी विभिन्न प्रकार के जांच के रेट तय किये जाने चाहिए। लेकिन स्वास्थ्य महकमा और जिला प्रशासन (Health Administration) की चुप्पी के चलते निजी लैब वाले मरीजों के पॉकिट पर ‘डाका’ डाल रहे हैं। बेबस मरीज और उनके तीमारदार जिला और स्वास्थ्य प्रशासन की लापरवाही के शिकार हो रहे हैं।
नागरिकों का यह भी कहना है कि कोरोना काल में एक भी केस मिलता था तो जिला प्रशासन, स्वास्थ्य महकमा ही नहीं तमाम अन्य विभाग सक्रिय हो जाते थे। लेकिन अब तो डेंगू, चिकनगुनिया आदि के केस मिलने के बाद भी गांव या शहर में फॉगिंग या फिर एंटी लार्वा दवा का छिड़काव नहीं की जाती। यह कैसी व्यवस्था है? इस पर आखिर लगाम कब कसेगा?
Health Administration : रिपोर्ट के लिए दो से तीन दिन का इंतजार
बदलते मौसम और मच्छरों के प्रकोप से वायरल फीवर के साथ ही डेंगू, चिकनगुनिया के मरीजों की संख्या बढ़ी है। सरकारी अस्पतालों (Health Administration) में डेंगू वार्ड से लेकर अन्य वार्ड मरीजों से भरे पड़े हैं। इसमें कुछ लोगों को डेंगू है तो कोई तेज बुखार, जोड़ों में दर्द और सिरदर्द का अस्पतालों में इलाज करा रहा हैं। डॉक्टर के पास जाने पर तत्काल जांच कराने की सलाह दी जाती है।

स्थिति यह है कि मंडलीय और जिला अस्पताल में डेंगू की रिपोर्ट (Health Administration) के लिए लोगों को दो से तीन दिन का इंतजार करना पड़ रहा है। इस वजह से बहुत से लोगों की दवा भी नहीं शुरू हो पा रही है। लिहाजा, लोग प्राइवेट लैब वालों के यहां जाने को विवश है, जहां चंद घंटों में ही जांच रिपोर्ट मिल जाती है। हालांकि इसके लिए मुंहमांगी कीमत अदा करनी पड़ती है। इस कीमत में ‘चिकित्सक का कमीशन’ भी जुड़ा रहता है।
चिकनगुनिया की चपेट में नौनिहाल तक
डेंगू के बीच चिकनगुनिया का प्रकोप भी बढ़ा है। इसकी चपेट में नौनिहाल तक आ चुके हैं और आ रहे हैं। सरकारी के साथ ही निजी अस्पतालों की ओपीडी व वार्डों में चिकनगुनिया पीड़ितों की भीड़ है। डॉक्टर भी परेशान हैं। डॉक्टरों का कहना है कि चिकनगुनिया के लक्षण भी डेंगू जैसे होते हैं। इस कारण लोग समझ नहीं पा रहे। जांच के बाद पुष्टि होती है। कोई तेज बुखार के साथ जोड़ों में दर्द, सिर दर्द, सूखी खांसी, सर्दी-जुकाम आदि की समस्या लेकर अस्पताल आ रहा तो किसी को कमजोरी है। मंडलीय अस्पताल कबीरचौरा, दीनदयाल उपाध्याय जिला अस्पताल, शास्त्री अस्पताल की ओपीडी में रोज पीड़ित (Health Administration) पहुंच रहे हैं।

मंडलीय अस्पताल के बाल रोग विभाग में हर दिन 15 से 20 बच्चों में चिकनगुनिया के लक्षण मिल रहे हैं। वरिष्ठ फिजिशियन डॉ. एसजे वर्मा की मानें तो चिकनगुनिया के मामले भी अधिक आ रहे हैं। बच्चे ज्यादा पीड़ित हैं। इसके लक्षण भी डेंगू, वायरल फीवर से मिलते-जुलते हैं। उनका कहना है कि जोड़ों में दर्द, सूजन के साथ ही कमजोरी, बुखार वाले पीड़ितों की संख्या बढ़ी है। यह चिकनगुनिया (Health Administration) के मिलते-जुलते लक्षण हैं। इसमें बच्चे के साथ ही 70 साल तक के लोग भी आ रहे हैं।
कोरोना जैसी ही खतरनाक है यह बीमारी
कोरोना जैसी ही एक खतरनाक बीमारी लोगों को डरा रही है। बुखार और ठंड , सिर में तेज दर्द इसके शुरूआती लक्षण है। महज एंटीबायोटिक से इसका इलाज हो रहा है। चिकित्सकों (Health Administration) का मानना है कि कोरोना का बदला हुआ नया वैरिएंट हो सकता है। इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता है। इसी आशंका के बीच कई सीजनल एलर्जी और इन्फेक्शन समेत कई अन्य बीमारियां सामने आ रही है।

यूपी के मथुरा, फिरोजाबाद, मैनपुर समेत कुछ जिलों में ‘स्क्रब टायफस’ से मौत की खबरें सामने आई हैं। शुरूआत में इस बीमारी को रहस्यमयी बुखार कहा जा रहा था। मथुरा में तो दो साल से लेकर 45 साल के 29 मरीज ‘स्क्रब टायफस’ के मिले थे। भले ही, यह वायरल बीमारी कोरोना से अलग है, लेकिन इसके लक्षण कोविड-19 से मिलते-जुलते हैं। ऐसे में बरसात के मौसम में इस बीमारी को लेकर अधिक सतर्क रहने की जरूरत है।
संक्रामक बीमारियों के डेंजर जोन में शहर
परेशान नागरिकों का कहना है कि संक्रामक बीमारियों (Health Administration) के डेंजर जोन के रूप में यह शहर तब्दील होता नजर आ रहा है। शहर से लेकर गांव तक कही भी न कीटनाशक दवाओं का छिड़काव हो रहा है और न ही कोई फॉगिंग करते हुए दिखाई दे रहा है। नगर निगम और स्वास्थ्य विभाग के इस लापरवाही का खामियाजा आम लोगों को भूगतना पड़ रहा है। मंडलीय, जिला अस्पताल, हेल्थ सेंटर से लेकर प्राइवेट हॉस्पिटल (Health Administration) में इलाज कराने के लिए मरीजों की लंबी लाइन लगी है।
अस्पतालों में जांच के बाद ज्यादातर मरीजों में डेंगू-मलेरिया और टायफाइड के लक्षण पाए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग (Health Administration) की ओर से जारी आंकड़ों पर गौर करें तो इस सीजन में अब 1.14 लाख से अधिक लोगों में मलेरिया की जांच कराई गई है, जिसमें 21 लोग पॉजीटिव पाए गए। वहीं 26 सौ से अधिक डेंगू के एलाइजा टेस्ट में अब तक 146 से ज्यादा लोगों में डेंगू की पुष्टि की गई है।

इसके अलावा 20 लोग चिकनगुनिया से पीड़ित पाए गए हैं। नागरिकों का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग के जिला मलेरिया विभाग एवं नगर निगम के नगर स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी डेंगू-मलेरिया से बचाव के लिए उपाय करने को हैं। इन दोनों विभाग की ओर से शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में संक्रामक बीमारियों के प्रति लोगों को जागरूक के लिए बेसिक हेल्थ वर्कर, आशा वर्कर, सुपरवाइजर व अफसरों समेत 27 सौ से अधिक लोगों की फौज है। लेकिन इनमें से कोई भी व्यक्ति शहर में कहीं भी दिखाई नहीं दे रहा और न ही कहीं फॉगिग व दवा का छिड़काव हो रहा।
यहां सबसे ज्यादा है समस्या
संक्रामक बीमारियां (Health Administration) उन क्षेत्रों में सबसे अधिक फैल रही है, जहां की आबादी घनी है। इसमें सामने घाट, भगवानपुर, नरिया, सीर गोवर्द्धनपुर, सुंदरपुर, डाफी, छित्तुपुर, मंडुवाडीह, शिवदासपुर, बड़ी गैबी, विनायका, कमच्छा, खोजवां, चितईपुर, नेवादा, अवलेशपुर, रानीपुर, पांडेयपुर, पहड़िया, रमरेपुर, लेढ़ूपुर, पंचकोसी, सरैया, जलालीपट्टी, जैतपुरा, कमलगढ़हा, कज्जाकपुरा, कोनिया, चौकाघाट, दारानगर, नाटी इमली, नयी बस्ती, ईश्वरगंगी, bhoजूबीर, अर्दली बाजार, सिकरौल, रामनगर आदि शामिल है।
इन दवाओं की बढ़ गयी है जबर्दस्त मांग
टैबलेट व सिरप पैरासीटामाल, टैबलेट व सिरप मोन्टेलुकास्ट लेवोसेटरीजीन-एलर्जी, टैबलेट विटामिन सी, टैबलेट बिलास्टिन एंड लेवोसेट्रीजीन-एलर्जी, टैबलेट व सिरप सफेसिम, टैबलेट व सिरप सिपोडाकस्सिम की मांग में इजाफा हुआ है। इसके अलावा (Health Administration) एंटीबायोटिक वाली दवाओं में टैबलेट व सिरप सेट्रीजीन-एलर्जी, टैबलेट व सिरप बी-काम्प्लेक्स, टैबलेट व सिरप मल्टी विटामिन, टैबलेट व सिरप फेक्सोफेनाडिन, टैबलेट व सिरप एलर्जी अजीथ्रोमायासीन, टैबलेट व सिरप रोसिथ्रोमायसिन, पेन किलर निमुसुलाइड और पैरासीटामोल कॉम्बिनेशन तथा पेन किलर एसीक्लोफिनेक एण्ड पैरासीटामोल आदि की भी खपत काफी बढ़ी है।

थोक व फुटकर दवा विके्रताओं की मानें तो आम दिनों की तुलना में इन दिनों तीन गुना से अधिक खपत बढ़ गयी है। रोजाना ढाई से तीन करोड़ रुपये से अधिक की ये दवाएं खप जा रही है।
इलाज के बगैर मरीज को नहीं लौटाया जाता : सीएमओ
मुख्य चिकित्साधिकारी (Health Administration) डॉ. संदीप चौधरी ने किसी भी मरीज को बिना इलाज के वापस नहीं किया जाता है। उन्होंने बताया कि वर्तमान में समय में वायरल फीवर के मरीजों की बढ़ोत्तरी के कारण पैथालॉजी जांच, एक्स-रे एवं अल्ट्रासाउण्ड की जांच में मरीजों की संख्या में वृद्धि हुई है, फिर भी सभी मरीज का एक्स-रे व जांच किया जाता है।