Varanasi: काशी के इतिहास में पहली बार भारत के प्रख्यात वैदिक महामनीषी एवं वेदिक सम्राट के श्रीकृष्णशास्त्री गोडशे गुरुजी की जन्मशताब्दी वर्ष पर भव्य श्रुतिस्मृति ज्ञान महोत्सव का आयोजन किया गया। महाराष्ट्र की अहिल्या नगर वेद पाठशाला की ओर से 14 अक्टूबर से 30 नवम्बर तक, पावन गंगा तट स्थित रामघाट स्थित श्री वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय इस दिव्य अनुष्ठान का केंद्र रहा।
कार्यक्रम (Varanasi) में त्यागमूर्ति पद्मश्री परमपूज्य गणेश्वरशास्त्री द्राविड गुरुजी एवं पूज्य विश्वेश्वरशास्त्री द्राविड की परम पावन उपस्थिति रही। मुख्य संचालन वेदमूर्ति देवेन्द्र रामचन्द्र गढीकर के मार्गदर्शन में हुआ।

Varanasi: कलाकारों ने दी अद्दभुत प्रस्तुति
इसे समापन समारोह पर श्री काशी विश्वनाथ धाम (Varanasi) वैदिक अनुगूँजों और भक्ति-राग से स्पंदित हो उठा। नागपुर की “शिवगर्जना बहुउद्देशीय संस्था, ढोल-ताशा व ध्वज पथक” के 70 कलाकारों ने अद्भुत प्रस्तुति देते हुए भगवान शिव को शिवांजलि अर्पित की।
ढोल-ताशों की गूंज ने वातावरण को शिवमय कर दिया। छोटे-बड़े कलाकार एक स्वर में लय साधते हुए थिरके। हजारों भक्त “हर-हर महादेव” के जयघोष में डूब उठे। भक्तों ने इसे “दिव्य अनुभूति” बताते हुए कहा — मानो शिव स्वयं धाम में नृत्य कर रहे हों।

वेद–वाणी की शुद्धता बनी रहे अक्षुण्ण
बताते चलें कि वैदिक मौखिक स्वर-विन्यास की आठ विधियों में दण्डक्रम सर्वाधिक जटिल माना जाता है। इसमें मंत्रों का विशिष्ट अनुलोम-विलोम, स्वर-क्रम और अक्षर-संरक्षण (Varanasi) के साथ पाठ किया जाता है — ताकि वेद-वाणी की शुद्धता अक्षुण्ण बनी रहे। यह पारायण न केवल विद्या, बल्कि तप और अनुशासन की चरम पराकाष्ठा का द्योतक है।
स्व. श्रीकृष्णशास्त्री गोडशे गुरुजी के जन्मशताब्दी वर्ष पर हुआ यह उत्सव वेद, संस्कृति, शिक्षा और साधना का अनुपम संगम बन कर काशी के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से दर्ज हुआ।

