Varanasi के नाटी इमली मैदान में बृहस्पतिवार को ऐतिहासिक भरत मिलाप का आयोजन हुआ। भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के सामने भरत और शत्रुघ्न जमीन पर लेट गए। दोनों छोटे भाइयों को इस तरह स्वागत करते देख राम और लक्ष्मण पुष्पक विमान से उतरकर उनकी ओर दौड़े और उन्हें उठाकर गले लगा लिया। चारों भाइयों के मिलन के साथ ही पूरा मैदान ‘जय श्रीराम’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से गूंज उठा।
इस भावुक दृश्य को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु नाटी इमली पहुंचे। काशी और आसपास के क्षेत्रों (Varanasi) के अलावा विदेशी पर्यटक भी इस ऐतिहासिक परंपरा के साक्षी बने। काशी नरेश हाथी पर सवार होकर आयोजन स्थल पहुंचे। कुछ ही मिनटों में संपन्न होने वाली इस लीला को देखने के लिए लोगों ने घंटों पहले मैदान और आसपास के स्थानों पर जगह घेर ली थी।
3 मिनट 36 सेकेंड में सिमटा सदियों पुराना इतिहास
चित्रकूट रामलीला समिति के व्यवस्थापक पं. मुकुंद उपाध्याय के मुताबिक, नाटी इमली (Varanasi) का भरत मिलाप करीब 483 वर्ष पुरानी परंपरा है। इसे संत मेघा भगत से जोड़कर देखा जाता है। आयोजन का मुख्य आकर्षण राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न का मिलन होता है, जो निर्धारित मुहूर्त में संपन्न कराया जाता है।
जैसे ही तय समय आया, भगवान राम और लक्ष्मण पुष्पक विमान से उतरे। भरत और शत्रुघ्न ने जमीन पर लेटकर उनका स्वागत किया। इसके बाद राम ने भरत को और लक्ष्मण ने शत्रुघ्न को गले लगाया। भाइयों के इस मिलन के दौरान मैदान में मौजूद श्रद्धालु जयकारे लगाने लगे। समिति (Varanasi) के अनुसार, यह दृश्य करीब 3 मिनट 36 सेकेंड में संपन्न हुआ, लेकिन इसे देखने के लिए श्रद्धालुओं में खासा उत्साह रहा।
पांच टन के पुष्पक विमान को कंधों पर लेकर पहुंचे यादव बंधु
भरत मिलाप (Varanasi) की परंपरा में यादव बंधुओं की भूमिका भी खास मानी जाती है। पारंपरिक धोती, बनियान और सिर पर पगड़ी पहने यादव बंधु पुष्पक विमान को अपने कंधों पर उठाकर लीला स्थल तक लाए। बताया गया कि विमान का वजन करीब पांच टन है।
काशी की लोकपरंपरा में इस दृश्य को रघुकुल और यदुकुल के जुड़ाव के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। विमान को कंधों पर उठाकर लाते यादव बंधु भी दर्शकों के आकर्षण का केंद्र रहे। उनके पहुंचते ही लोगों की निगाहें पुष्पक विमान और उस पर सवार भगवान राम-लक्ष्मण की ओर टिक गईं।
Varanasi: हाथी पर सवार होकर पहुंचे काशी नरेश
भरत मिलाप में काशी राजपरिवार (Varanasi) की भागीदारी भी आयोजन की परंपरा का हिस्सा है। इस बार काशी नरेश हाथी पर सवार होकर मैदान पहुंचे। उनके आगमन को देखने के लिए भी लोगों की भीड़ जुटी रही।
इस आयोजन में राजपरिवार की भागीदारी का ऐतिहासिक संबंध महाराजा उदित नारायण सिंह से बताया जाता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, उन्होंने वर्ष 1796 में इस लीला में शाही अंदाज में भाग लिया था। इसके बाद से राजपरिवार की पीढ़ियां इस परंपरा से जुड़ी रही हैं।
देश-विदेश से पहुंचे श्रद्धालु और पर्यटक
नाटी इमली (Varanasi) के आसपास सुबह से ही लोगों का पहुंचना शुरू हो गया था। बेहतर जगह पाने के लिए कई दर्शक घंटों पहले पहुंच गए। मैदान के साथ जैतपुरा, लोहटिया, मैदागिन और आसपास के क्षेत्रों में भी लोगों की आवाजाही बनी रही।
विदेशी पर्यटक भी इस आयोजन को देखने पहुंचे। कई श्रद्धालु चारों भाइयों के मिलन के दृश्य को अपने मोबाइल कैमरों में कैद करते नजर आए। भगवान राम और उनके भाइयों के पुनर्मिलन की यह लीला प्रेम, त्याग, समर्पण और पारिवारिक रिश्तों की महत्ता का संदेश देती है।
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नाटी इमली का भरत मिलाप केवल धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि काशी की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ी एक विशिष्ट परंपरा है। निर्धारित मुहूर्त में कुछ मिनट के लिए होने वाला भाइयों (Varanasi) का मिलन देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में लोग जुटते हैं।
