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Gulab Bari: काशी में जीवंत है गुलाबबाड़ी की परम्परा, रईसों के यहां पहले सजती थी गुलाबबाड़ी की महफिल

by Abhishek Seth
March 11, 2023
in वाराणसी, स्पेशल स्टोरी
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gulab bari
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Gulab Bari in Kashi

  • इत्र-गुलाल-गुलाब की पंखुड़ियों की होती थी बौछार
  • कई संस्थाओं ने फिर से की है शुरूआत

राधेश्याम कमल

वाराणसी। चैत आ गया है। फिजां में चैती बयार बहने लगी है। बाग-बगीचों में चैती गुलाब गमकने लगे हैं। जिया अलसाने लगा है। गायक-गायिकाएं चैती गायन के लिए मचलने लगे हैं। काशी में होली के बाद चैत मास में गुलाबबाड़ी की महफिल जवान हुआ करती थी। हालांकि यह परम्परा काशी में अभी भी जीवंत है। गुलाबबाड़ी का आयोजन चैत मास में किया जाता है। कहते है कि इस मास में जो भी फूल खिलते हैं वह काफी सुगंधित होते हैं। इनमें जो प्रिय फूल माना गया है वह चैती गुलाब है। चैत मास में जो चैती गुलाब खिलता है उसकी सुगंध दिल को बहुत ही भाती है। चैत मास में गुलाबबाड़ी का इसलिए होता है कि चैती गुलाब की पंखुड़ियों से मौसम को ठंडा किया जाय। फागुन के बाद चैत मास आता है। काशी में जो पहले के रईस थे वे संगीत समारोहों को अपने यहां आयोजित किया करते थे। इस आयोजन का नाम उन्होंने गुलाबबाड़ी दे रखा था। गुलाल एक ऐसा शब्द है जो होली के बाद खेला जाता है। होली खत्म होती है, चैत शुरू होता है। भगवान को प्रसन्न करने के लिए गुलाबबाड़ी का आयोजन हुआ करता था। इस आयोजन में लोग गुलाब की पंखुड़ियों के अलावा इत्र-गुलाल उड़ाया करते थे। इत्र में खस, गुलाब व केवड़ा सभी चैत मास के इत्र है। फागुन के बाद चैत आयेगा तो इसका मतलब है कि खस का मौसम आ गया।

गुलाबबाड़ी से जुड़ा है पूर्व काशीनरेश व भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का नाम

बनारस में गुलाबबाड़ी की शुरूआत 1730 के आसपास मानी जाती है। गुलाबबाड़ी का आयोजन पहले पूर्व काशी नरेश ईश्वरी नारायण सिंह, पूर्व काशी नरेश डा. विभूति नारायण सिंह के जमाने में हुआ करता था। बाद में राजा सर मोतीचंद, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र व बनारस के रईस विष्णु राम ने इसे करवाया। कहते हैं कि उन दिनों जितने भी राजा-महराजा थे सभी चैत मास में काशी आकर टिक जाते थे और अपने-अपने बनाये गये स्थलों पर गुलाबबाड़ी का आयोजन करते थे। गुलाबबाड़ी में गुलाब जल, खस व गुलाब की पंखुड़ियां उड़ायी जाती थी। उस जमाने में गुलाबबाड़ी की महफिलों में बांके सैंया न जाने मन की बतिया, नई झूलनी की छइयां दुपहरिया बलमा, फूलवा बीनन हम जाइब हो रामा, जो श्याम को बरजोरी गारी दूंगी मैं घूंघट पलट के समेत कई गीत गूंजते थे। गुलाबबाड़ी पहले काशी के रईसों के यहां होती थी इनमें प्रमुख रूप से राय परिवार, शापुरी परिवार, रमण परिवार के लोग हुआ करते थे।

सिद्धहस्त गायिकाओं का होता था गायन

गुलाबबाड़ी में उन दिनों बनारस की सिद्धहस्त गायिकाओं का गायन होता था। इनमें मुख्य रूप से विद्याधरी देवी, बड़ी मोती, हुस्ना बाई, राजेश्वरी देवी, छोटी मैना, छोटी मोती, जवाहर, टामी थीं। बाद में इसमें प्रख्यात गायिका सिद्धेश्वरी देवी, निर्मला देवी, बागेश्वरी देवी व पद्मविभूषण गिरिजा देवी आयीं। काशी में 1954 में जब संगीत परिषद का गठन हुआ तब परिषद ने 1956 में नागरी नाटक मंडली में गुलाबबाड़ी का आयोजन किया था। इसमें प्रसिद्ध गायिका सिद्धेश्वरी देवी का गायन हुआ था। उनके साथ भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां (शहनाई) व तबला सम्राट पद्मविभूषण स्व. पं. किशन महराज (तबला) तथा सारंगी पर गोपाल मिश्र रहे।

वर्ष 1974 में एक पंचसितारा होटल में हुआ आयोजन

वर्ष 1962 तक गुलाबबाड़ी का आयोजन चला लेकिन कालांतर में यह बंद हो गया। वर्ष 1974 में गुलाबबाड़ी का आयोजन एक कैंटोंमेंट स्थित एक पंचसितारा होटल में किया गया। इसमें प्रख्यात गायिका सविता देवी का गायन हुआ था। इसके बाद यह आयोजन एकदम बंद हो गया। हालांकि कई साल बाद कई संस्थाओं ने इसे पुन: शुरू किया। इसमें काशी की सांस्कृतिक संस्था कला प्रकाश का नाम अग्रणी है। संस्था के अध्यक्ष अशोक कपूर ने इसे पुर्नजीवित किया। इसी तरह नगर के प्रमुख उद्यमी राजेश जैन ने भी गुलाबबाड़ी का आयोजन कर इसे जीवंत किया है। इस बार भी रवीन्द्रपुरी में कला प्रकाश की ओर से 18 मार्च को यह आयोजन किया जा रहा है। इसमें श्रीमती सुचरिता गुप्ता का गायन व पद्मश्री पं. शिवनाथ मिश्र व देवव्रत मिश्र का सितारवादन होगा। इसी तरह ज्ञान प्रवाह व संगीत परिषद के संयुक्त तत्वावधान में सामनेघाट स्थित ज्ञान प्रवाह में 11 मार्च को वासंतिकी का आयोजन किया गया है जिसमें पद्मभूषण उस्ताद राशिद खान का गायन होगा।

महफिल में बैठने का अलग रहा अंदाज

गुलाबबाड़ी की महफिल में भारतीय पद्धति के अनुसार बैठने की परम्परा हुआ करती थी। सामने की ओर मंच हुआ करता था जिस पर गायक-गायिकाएं बैठ कर गायन पेश करते थे। कलाकारोें व अतिथियों का स्वागत गुलाबजल, खस, केवड़ा गुलाब की पंखुड़ियों से किया जाता था। इससे पूरा माहौला सुगंधित हो जाता था।

क्या है गुलाबबाड़ी

गुलाबबाड़ी में प्रयुक्त शब्द बाड़ी संस्कृत के शब्द वारि से बना है। जिसका अर्थ उद्यान है। गुलाबबाड़ी का आयोजन सामान्य तौर पर उद्यानों या पुरानी हवेलियों में जिसमें झरोखें (वारी) अथवा बाड़ी (घर) में होते थे। लेकिन गुलाबबाड़ी का आयोजन न तो घर में होता है और न ही किसी बांग्ला परिवार से इसके संबंध में कोई दृष्टांत मिलता है।

मीर रुस्तम अली ने की थी शुरूआत

काशी में गुलाबबाड़ी की शुरूआत 1730 में अवध के नवाब के तत्कालीन सूबेदार मीर रुस्तम अली ने किया था। वे खुद गायन वादन में सिद्धहस्त थे। इस उत्सव का आरंभ मार्च-अप्रैल में होता है। इस दौरान चैती गुलाब की एक विशिष्ट प्रजाति विकसित होती है, जो हल्के गुलाबी रंग के साथ अपनी मोहक सुगंध से सभी को अपने मोहपाश में बांध लेती है।

नागरी नाटक मंडली के मैदान में होता था आयोजन

नागरी नाटक मंडली के मैदान में पहले गुलाबबाड़ी होती थी। गुलाबी रंग की चांदनी स्टेज पर सजायी जाती थी। एक तरफ सफेद कुर्ता पैजामा व दुपल्ली (टोपी) पहने पुरुष तो दूसरी तरफ गुलाबी परिधान में महिलाएं बैठती थी। यहां सिद्धहस्त गायिकाओं में बड़ी मोती, रसूलन बाई, सिद्धेश्वरी देवी का गायन हो चुका है। इसमें तबला सम्राट पं. किशन महराज (तबला) व भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां शहनाई से संगत कर चुके हैं। काशी संगीत समाज में 1906 से गुलाबबाड़ी का आयोजन हो रहा है। यहां पर संगीताचार्य बड़े रामदास, छोटे रामदास से लेकर हर गायक व गायिकाओं की भागीदारी हो चुकी है।

कला प्रकाश ने फिर से की शुरूआत

नगर की सांस्कृतिक संस्था कला प्रकाश की ओर से गुलाबबाड़ी को 2002 में फिर से दोहराया गया। वर्ष 2005 में इसे पुन: वास्तविक स्वरूप में बगीचे में लाया गया। अध्यक्ष अशोक कपूर की मानें तो उनके यहां प्रख्यात गायिका श्रीमती गिरिजा देवी, कथक सम्राट पं. बिरजू महराज, प्रख्यात शास्त्रीय गायक पं. राजन-साजन मिश्र, शोभा मुद्गल, अश्विनी भिंड़े, पं. छन्नू लाल मिश्र, पद्मश्री मालिनी अवस्थी, आरती अंकलेकर समेत कई का गायन हो चुका है।

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