Varanasi: चौबेपुर और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में अब चौपालों, चाय की दुकानों, पुस्तकालयों और कोचिंग संस्थानों में खेती-किसानी से ज्यादा प्रतियोगी परीक्षाओं, पेपर लीक,सरकारी भर्तियों और रोजगार जैसे मुद्दों पर चर्चा हो रही है। ग्रामीण परिवेश में वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मी इस पीढ़ी का कहना है कि गांव के छात्र भी शहरों की तरह कड़ी मेहनत करते हैं, इसलिए परीक्षा प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी और निष्पक्ष होनी चाहिए।
इसके अलावा जेन-ज़ी के दबाव में भारत सरकार ने सख्त कानून बनाकर देशभर में प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और भर्ती अनियमितताओं के खिलाफ युवाओं के लगातार विरोध और जनदबाव के बाद सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा अनुचित साधनों की रोकथाम अधिनियम लागू कर प्रयास नकल रोकने का प्रयास कर रही है।
हालांकि ग्रामीण युवाओं (Varanasi) का कहना है कि केवल कानून बनाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसका सख्ती से पालन और दोषियों पर त्वरित कार्रवाई भी जरूरी है, ताकि मेहनती अभ्यर्थियों का विश्वास कायम रहे।
आइए जानते हैं क्या है सभी का कहना
वहीं बात करने पर जाल्हूपुर (Varanasi) की छात्रा अंशिका यादव ने कहा कि गांव की छात्राएं भी शहरों के छात्रों की तरह मेहनत करती हैं, इसलिए उनकी मेहनत का सम्मान होना चाहिए।

सन्दहाँ की छात्रा खुशी सिंह ने कहा कि सोशल मीडिया ने गांव की बेटियों को अपनी बात रखने का बड़ा मंच दिया है।

प्रतियोगी अभ्यर्थी कीर्ति सेठ निवासी चौबेपुर (Varanasi) ने कहा कि पेपर लीक का सबसे ज्यादा नुकसान गरीब परिवारों के बच्चों को होता है, इसलिए दोषियों को जल्द और कड़ी सजा मिलनी चाहिए।

शिखर वर्मा निवासी पहड़िया ने कहा कि युवा केवल नौकरी नहीं, बल्कि भरोसेमंद और पारदर्शी व्यवस्था चाहते हैं,अभिभावक दुर्गेश वर्मा ने कहा कि बच्चे वर्षों मेहनत करते हैं और पेपर लीक होने पर सबसे अधिक पीड़ा माता-पिता को होती है।

इसके आलावा सोनी सेठ ने कहा कि सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए, जिससे मेहनती छात्रों का भविष्य सुरक्षित रह सके।

चाहते हैं निष्पक्ष और पारदर्शी चयन प्रक्रिया
चौबेपुर (Varanasi) के एक प्रतियोगी परीक्षा कोचिंग संस्थान के संचालक शुभम सिंह ने कहा, आज गांव के छात्र पहले से कहीं अधिक जागरूक हैं। वे केवल परीक्षा पास करना नहीं चाहते, बल्कि निष्पक्ष और पारदर्शी चयन प्रक्रिया भी चाहते हैं। पेपर लीक जैसी घटनाओं से छात्रों का मनोबल टूटता है। सरकार ने सख्त कानून बनाकर अच्छा कदम उठाया है,अब इसका प्रभावी क्रियान्वयन भी उतना ही जरूरी है।

वहीं बात करने पर बीएचयू (Varanasi) के शिक्षाविद् प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि एक शिक्षक और शोधकर्ता के रूप में मैं ग्रामीण क्षेत्रों में जेन-ज़ी की दस्तक को बड़ी आशा से देखता हूँ। गाँवों के ये युवा अब डिजिटल माध्यमों और शिक्षा के जरिए नई दुनिया से जुड़ रहे हैं, फिर भी अपनी मिट्टी और लोक परंपराओं में गहराई से जुड़े हुए हैं।

Varanasi: जनसंख्या आनुवंशिकी का अध्ययन
जनसंख्या आनुवंशिकी के हमारे भी अध्ययन बताते हैं कि भारत की जनसंख्या विविधता गाँव में ही है; और आज यही ज्ञान इन युवाओं तक डिजिटल माध्यमों से पहुँचने लगा है। जब ये युवा जिज्ञासा, वैज्ञानिक सोच और जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ते हैं, तो ग्रामीण (Varanasi) भारत का भविष्य और भी उज्ज्वल दिखता है। मुझे विश्वास है कि यही जेन-ज़ी पीढ़ी गाँवों में बसी भारत की अक्षुण्ण विरासत को नई ऊँचाइयों तक ले जाएगी।
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सचमुच, चौबेपुर और आसपास के गांवों में जेन-ज़ी की बदलती सोच यह संकेत दे रही है कि ग्रामीण युवा अब केवल सरकारी नौकरी पाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि निष्पक्ष परीक्षा, पारदर्शी भर्ती और जवाबदेह व्यवस्था की भी मांग कर रहे हैं। चौपालों, पुस्तकालयों और कोचिंग संस्थानों से उठ रही यह आवाज बताती है कि डिजिटल युग में गांवों की नई पीढ़ी अपने अधिकारों और भविष्य को लेकर पहले से अधिक जागरूक हो चुकी है।

