श्रावण मास में हर-हर महादेव और बम-बम भोले के जयघोष के बीच Kashi से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसने धर्म और मजहब की सीमाओं से कहीं ऊपर इंसानियत और आस्था की मिसाल पेश की है। जन्म से मुस्लिम होने के बावजूद रुबीना अंसारी वर्षों से भगवान शिव की आराधना कर रही हैं। उनकी कहानी न केवल अटूट श्रद्धा का उदाहरण है, बल्कि सामाजिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता का भी सशक्त संदेश देती है।
आस्था के इस अनोखे स्वरूप ने एक बार फिर यह साबित किया है कि सच्ची भक्ति किसी जाति, धर्म या पंथ की मोहताज नहीं होती। काशी की गलियों से निकली यह कहानी ऐसे समय में सामने आई है, जब समाज में धर्म के नाम पर बहस और मतभेद अक्सर सुर्खियां बनते हैं।

महादेव की नगरी में आस्था का अनोखा उदाहरण
सियासी मंचों पर भले ही धर्म के नाम पर बहस और सोशल मीडिया पर धार्मिक उन्माद की चर्चा होती हो, लेकिन महादेव की नगरी काशी (Kashi) में सामाजिक समरसता की एक अलग ही तस्वीर दिखाई देती है। गाजीपुर की मूल निवासी रुबीना अंसारी जन्म से मुस्लिम हैं, लेकिन उनकी आस्था भगवान शिव में है। वह नियमित रूप से काशी के मंदिरों में दर्शन करने जाती हैं, भोलेनाथ का जलाभिषेक करती हैं और पूरी श्रद्धा के साथ बेलपत्र भी अर्पित करती हैं।
Kashi: दस वर्षों से अडिग है शिवभक्ति
रुबीना अंसारी पिछले करीब दस वर्षों से नियमित रूप से भगवान शिव की आराधना कर रही हैं। श्रावण मास हो, महाशिवरात्रि हो या सावन का सोमवार, वह पूरे विधि-विधान और श्रद्धा के साथ व्रत रखती हैं और पूजा-अर्चना करती हैं। उनका कहना है कि भगवान शिव के प्रति उनकी आस्था समय के साथ और अधिक मजबूत होती गई है।
सनातन परंपरा के मूल भाव से जुड़ी श्रद्धा
सनातन परंपरा में भगवान शिव को करुणा, समरसता और लोककल्याण का देवता माना जाता है। शिव का दरबार ऐसा स्थान माना जाता है, जहां ऊंच-नीच, जात-पात या किसी भी प्रकार के भेदभाव का स्थान नहीं है। रुबीना की शिवभक्ति (Kashi) भी इसी भावना को जीवंत करती है। उनकी आस्था केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इस विश्वास को मजबूत करती है कि जब श्रद्धा सच्ची हो, तो मानवता सबसे बड़ा धर्म बन जाती है।

गाजीपुर से काशी तक का सफर
रुबीना का बचपन भले ही गाजीपुर में बीता, लेकिन उनका मन हमेशा काशी (Kashi) से जुड़ा रहा। दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद वह वाराणसी आ गईं। यहां उन्होंने इंटरमीडिएट की शिक्षा पूरी की और इसके बाद महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ से स्नातक तथा स्नातकोत्तर की पढ़ाई पूरी की। वर्तमान में वह एक रियल एस्टेट कंपनी में कार्यरत हैं और अपनी नौकरी के साथ धार्मिक आस्था को भी पूरी निष्ठा से निभा रही हैं।
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रुबीना ने बताया कि वह पिछले 12 वर्षों से नवरात्र का व्रत रखती हैं। इसके साथ ही सावन के सोमवार और महाशिवरात्रि (Kashi) का व्रत भी नियमित रूप से करती हैं। उन्होंने बताया कि शुरुआत में परिवार और रिश्तेदारों ने उन्हें इन धार्मिक गतिविधियों से दूर रहने की सलाह दी थी। हालांकि, समय के साथ उनकी अटूट श्रद्धा और समर्पण को देखकर परिवार का नजरिया बदल गया। अंततः परिवार ने उनकी धार्मिक आस्था का सम्मान किया और उन्हें अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा-पाठ करने की अनुमति दे दी। रुबीना के पिता सेवानिवृत्त शिक्षक हैं।

