Ghazipur: जंगीपुर के बहुचर्चित ट्रांसफार्मर प्रकरण में विभागीय कार्रवाई के बाद अब मामले ने नया मोड़ ले लिया है। 9 ट्रांसफार्मरों के गायब होने के मामले में जहां एक ओर अवर अभियंता (JE) और उपखंड अधिकारी (SDO) को निलंबित कर दिया गया है, वहीं सबसे बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया है कि जिस अधिकारी ने सबसे पहले चोरी की सूचना दी, वही निलंबन की जद में क्यों आया? यह सवाल अब सिर्फ विभाग तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस का विषय बन गया है।
सबसे पहले सामने लाए थे मामला
जानकारी के अनुसार, JE राजीव कुमार गुप्ता ने 19 जुलाई 2025 को नोनहरा थाने (Ghazipur) में नौ ट्रांसफार्मरों की चोरी के संबंध में तहरीर देकर मामले को उजागर किया था, लेकिन हैरानी की बात यह रही कि इस गंभीर सूचना के बावजूद प्रारंभिक स्तर पर कोई ठोस कानूनी कार्रवाई नहीं हुई। इसके उलट, महज दस दिनों के भीतर 29 जुलाई 2025 को उनका तबादला फतेहपुर कर दिया गया। यही घटनाक्रम अब पूरे प्रकरण को और संदिग्ध बना रहा है।
15 अप्रैल 2026 को जारी आदेश में JE राजीव कुमार गुप्ता और SDO प्रमोद कुमार को कर्तव्यों में लापरवाही और आर्थिक क्षति के आधार पर निलंबित कर दिया गया। लेकिन घटनाओं की टाइमलाइन को देखते हुए अब यह सवाल उठ रहा है-
- क्या JE की भूमिका केवल सूचना देने तक सीमित थी,
- या जांच में उनकी भी कोई जिम्मेदारी तय की गई है?
अगर जिम्मेदारी थी, तो कार्रवाई में इतना विलंब क्यों हुआ? और अगर नहीं थी, तो फिर निलंबन का आधार क्या है?
जुलाई 2025 में बेनसागर फीडर से 9 ट्रांसफार्मर (Ghazipur) गायब होने का मामला सामने आया था। विभागीय कार्रवाई में अब तक 7 ट्रांसफार्मर बरामद दिखाए गए हैं, जबकि 2 अब भी लापता हैं। यह भी सवाल उठ रहा है कि शुरुआती स्तर पर यदि समय रहते कार्रवाई होती, तो क्या स्थिति अलग हो सकती थी?
Ghazipur: तकनीकी गड़बड़ी ने बढ़ाई गंभीरता
जांच के दौरान यह भी सामने आया कि कुछ 25 KVA ट्रांसफार्मरों को बिना स्वीकृति 63 KVA में परिवर्तित किया गया। इसे विभागीय नियमों का गंभीर उल्लंघन माना जा रहा है। इससे न सिर्फ तकनीकी जोखिम बढ़ता है, बल्कि विभाग को संभावित आर्थिक नुकसान भी होता है।
सांसद के हस्तक्षेप के बाद तेज हुई जांच
यह मामला लंबे समय तक दबा रहा, लेकिन जनवरी 2026 में सांसद अफजाल अंसारी द्वारा दिशा बैठक में उठाए जाने के बाद विभाग हरकत में आया। इसके बाद जांच तेज हुई और अंततः निलंबन जैसी कार्रवाई सामने आई। मामले में एक और अहम पहलू लंबे समय तक एक ही स्थान पर तैनाती का है। संबंधित उपखंड में वर्षों से जमे धिकारियों की भूमिका और निगरानी व्यवस्था भी अब सवालों के घेरे में है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी लंबी तैनाती स्थानीय (Ghazipur) स्तर पर प्रभाव और नियंत्रण को बढ़ा सकती है, जिससे जवाबदेही कमजोर पड़ती है।
विभागीय सूत्रों का दावा है कि यदि पूरे जिले के सभी फीडरों की किसी स्वतंत्र एजेंसी या स्टेट विजिलेंस से तकनीकी जांच कराई जाए, तो और भी बड़ा घोटाला सामने आ सकता है।हालांकि इन दावों की आधिकारिक (Ghazipur) पुष्टि अभी नहीं हुई है।

