Varanasi: अगर मन में कुछ कर गुजरने का जुनून हो तो संसाधनों की कमी भी रास्ता नहीं रोक सकती। इस बात को काशी के छित्तूपुर क्षेत्र में रहने वाले दो किशोर मूर्तिकार श्रेयांश विश्वकर्मा और किशन विश्वकर्मा सच साबित कर रहे हैं। दोनों पिछले आठ वर्षों से अपने जेब खर्च के पैसे इकट्ठा करके मां दुर्गा समेत विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बना रहे हैं। खास बात यह है कि दोनों ने मूर्ति बनाने का हुनर किसी संस्थान या प्रशिक्षक से नहीं सीखा, बल्कि गूगल के माध्यम से इसकी बारीकियां समझीं और अपने हाथों से प्रतिमाएं गढ़ने लगे। इस वर्ष दोनों ने मां दुर्गा की ऐसी अनोखी प्रतिमा तैयार की है, जिसकी आंखें अपने आप खुलती और बंद होती हैं। प्रतिमा को देखकर ऐसा प्रतीत होता है, मानो मां स्वयं अपनी आंखें बंद कर ध्यान कर रही हों और फिर आंखें खोलकर भक्तों को निहार रही हों।
दोनों किशोरों की बनाई प्रतिमा इन दिनों लोगों के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है। मां दुर्गा के सामने हाथ जोड़कर स्वागत करती दो देवी स्वरूप प्रतिमाएं (Varanasi) भी बनाई गई हैं। इन प्रतिमाओं की सजावट और भाव-भंगिमा श्रद्धालुओं का ध्यान खींच रही हैं। खास बात यह है कि इस पूरी कलाकारी के पीछे किसी बड़े कलाकार का प्रशिक्षण नहीं, बल्कि दो बच्चों की लगन, मेहनत और सीखने की जिज्ञासा है।
आठ साल से जेब खर्च जोड़कर बना रहे प्रतिमाएं
श्रेयांश विश्वकर्मा कक्षा 12 और किशन विश्वकर्मा कक्षा 10 के छात्र हैं। पढ़ाई के साथ दोनों को मूर्तिकला का ऐसा शौक लगा कि उन्होंने इसे अपनी साधना बना लिया। पिछले आठ वर्षों से दोनों अपने सालभर के जेब खर्च (Varanasi) को इकट्ठा करते हैं और उसी रकम से मां दुर्गा समेत अन्य देवी-देवताओं की प्रतिमाएं तैयार करते हैं।
श्रेयांश के अनुसार, एक बार में प्रतिमाएं तैयार करने में लगभग 20 से 25 हजार रुपये तक खर्च हो जाते हैं। इसके बावजूद दोनों अपने शौक और आस्था से पीछे नहीं हटते। इस वर्ष मां दुर्गा की भव्य प्रतिमा तैयार करने में उन्हें करीब एक महीने का समय लगा। मिट्टी से प्रतिमा (Varanasi) का स्वरूप तैयार करने से लेकर उसे सजाने और अन्य देवी-देवताओं की आकृतियां बनाने तक, दोनों ने अपनी मेहनत से इस काम को पूरा किया।
Varanasi: गूगल बना गुरु, बिना प्रशिक्षण सीखी मूर्तिकला
आज के दौर में जहां मूर्तिकला सीखने के लिए लोग प्रशिक्षण संस्थानों का सहारा लेते हैं, वहीं श्रेयांश और किशन ने इंटरनेट को ही अपना गुरु बना लिया। दोनों गूगल पर उपलब्ध जानकारी और अन्य सामग्री की मदद से मूर्ति बनाने की तकनीक सीखते रहे। धीरे-धीरे अभ्यास करते हुए उन्होंने अपनी कला को निखारा और अब ऐसी प्रतिमाएं बना रहे हैं, जिनमें बारीकियों के साथ भावनाओं को भी उकेरा गया है।
इस वर्ष मां दुर्गा की प्रतिमा (Varanasi) की विशेषता उसकी आंखें हैं, जो अपने आप खुलती और बंद होती हैं। इसके अलावा दोनों किशोरों ने भगवान गणेश, भगवान कार्तिकेय, देवी लक्ष्मी और देवी सरस्वती की प्रतिमाएं भी तैयार की हैं। इनके साथ उनके वाहन मूषक, सिंह, उल्लू और मयूर की आकृतियां भी बनाई गई हैं।
प्रतिमाओं को छित्तूपुर की बड़ी महारानी श्री नवरात्रि पूजन उत्सव (Varanasi) में पुआल से बने मंदिर में स्थापित किया गया है। यहां मां दुर्गा के साथ अन्य देवी-देवताओं के दर्शन के लिए श्रद्धालु पहुंच रहे हैं।
मनोज तिवारी के गीत से मिली प्रतिमा बनाने की प्रेरणा
श्रेयांश विश्वकर्मा ने बताया कि इस वर्ष मां दुर्गा की प्रतिमा तैयार करने के पीछे एक भोजपुरी गीत से मिली प्रेरणा भी शामिल है। उन्होंने बताया कि प्रसिद्ध गायक मनोज तिवारी का गीत ‘लागे माटी के मुरतिया बोल देही’ सुनकर उनके मन में ऐसी प्रतिमा (Varanasi) बनाने का विचार आया, जो देखने में जीवंत प्रतीत हो। इसी सोच के साथ दोनों ने मां दुर्गा की आंखों को इस तरह तैयार किया कि वे अपने आप खुलती और बंद होती हैं।
श्रेयांश ने बताया कि उनके पिता पानीपुरी बेचकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं। दोनों भाई पढ़ाई करते हैं और इसके साथ ही मूर्तिकला के प्रति अपने जुनून को भी आगे बढ़ा रहे हैं। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने कभी अपनी कला को रुकने नहीं दिया। दोनों का मानना है कि यदि व्यक्ति किसी काम को करने की ठान ले तो मेहनत और लगन के बल पर उसे पूरा किया जा सकता है।
पिता ने बढ़ाया हौसला, आठ साल पहले शुरू हुआ सफर
दोनों बच्चों के इस सफर में परिवार का सहयोग भी अहम रहा है। श्रेयांश के पिता ने बताया कि जब बच्चों ने पहली बार मूर्ति बनाना शुरू किया था, तब उन्होंने उनका उत्साह बढ़ाया और आगे भी बेहतर प्रतिमाएं बनाने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बच्चों को घर में प्रतिमा स्थापित करके विधि-विधान (Varanasi) से नौ दिनों तक पूजन करने के लिए प्रोत्साहित किया। बच्चों ने उनकी बात को अपनाया और धीरे-धीरे यह प्रयास परंपरा का रूप लेता गया।
बेबी सिंह कुशवाहा ने बताया कि श्रेयांश और किशन पिछले आठ वर्षों से अपने हाथों से देवी-देवताओं की प्रतिमाएं (Varanasi) बना रहे हैं। नवरात्र के पहले दिन प्रतिमाओं की स्थापना की जाती है और पूरे नौ दिनों तक विधि-विधान से पूजन-अर्चन होता है। नवमी के दिन विशेष पूजा के साथ विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है। इसके बाद दसवें दिन मां की विदाई होती है, जिसमें श्रद्धालु शामिल होकर सिंदूर खेलते हैं।
त्योहारों पर निशुल्क प्रतिमाएं बनाकर करते हैं सहयोग
श्रेयांश और किशन की खासियत केवल अपनी पूजा के लिए प्रतिमाएं बनाना ही नहीं है, बल्कि वे सामाजिक सहयोग में भी आगे रहते हैं। बेबी सिंह कुशवाहा के अनुसार, क्षेत्र में जब भी कोई त्योहार आता है और लोग (Varanasi) प्रतिमा बनाने का आग्रह करते हैं, तो दोनों किशोर इसके लिए तैयार हो जाते हैं। वे मां काली, मां दुर्गा, भगवान गणेश और देवी लक्ष्मी सहित विभिन्न देवी-देवताओं की प्रतिमाएं बनाकर लोगों को निशुल्क देते हैं।
इसके बदले वे किसी प्रकार का शुल्क नहीं लेते। दोनों का उद्देश्य अपनी कला के माध्यम से लोगों की आस्था और धार्मिक आयोजनों में सहयोग करना है। उनकी इस पहल से क्षेत्र के लोग भी प्रभावित हैं।
मेहनत, हुनर और आस्था की अनूठी मिसाल
छित्तूपुर (Varanasi) के इन दोनों किशोरों की कहानी केवल मूर्ति बनाने तक सीमित नहीं है। यह सीमित संसाधनों में बड़े सपने देखने, इंटरनेट के माध्यम से हुनर सीखने और अपनी मेहनत से उसे निखारने की प्रेरणादायक मिसाल है। एक ओर दोनों अपनी पढ़ाई जारी रखे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर अपनी कला से धार्मिक आयोजनों को विशेष बना रहे हैं।
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अपने जेब खर्च से प्रतिमाएं बनाने से लेकर जरूरतमंद लोगों को निशुल्क मूर्तियां देने तक, श्रेयांश और किशन ने यह दिखाया है कि कला का उद्देश्य केवल कमाई नहीं, बल्कि सेवा और आस्था भी हो सकता है। मां दुर्गा की खुलती-बंद होती आंखों वाली प्रतिमा उनके इसी जुनून और रचनात्मक सोच का उदाहरण है। दोनों किशोरों की मेहनत यह संदेश देती है कि यदि मन में कुछ नया करने की इच्छा हो तो साधनों की कमी के बावजूद अपनी अलग पहचान बनाई जा सकती है।
