Varanasi Temple: काशी को भगवान शिव की नगरी यूं ही नहीं कहा जाता। यहां गंगा के किनारे बसे प्रत्येक शिवालय की अपनी अलग मान्यता, परंपरा और पौराणिक कथा है। इन्हीं प्राचीन और अनूठे शिवालयों में केदार घाट के समीप स्थित गौरी केदारेश्वर मंदिर का विशेष स्थान है। मान्यता है कि यहां भगवान केदारेश्वर के दर्शन करने से हिमालय स्थित केदारनाथ धाम के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। सावन में इस मंदिर की धार्मिक महत्ता और बढ़ जाती है। गंगा स्नान के बाद बाबा का जलाभिषेक करने के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु पहुंचते हैं।
गौरी केदारेश्वर मंदिर अपने स्वयंभू शिवलिंग की अनोखी संरचना के लिए भी प्रसिद्ध है। मंदिर (Varanasi Temple) में स्थापित शिवलिंग दो भागों में विभक्त दिखाई देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार एक भाग में भगवान शिव और माता पार्वती का शिव-शक्त्यात्मक स्वरूप तथा दूसरे भाग में भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी का हरिहरात्मक स्वरूप विद्यमान है। यही विशेषता इस मंदिर को काशी के अन्य शिवालयों से अलग पहचान देती है।
स्कंद पुराण में भी मिलता है मंदिर का उल्लेख
गौरी केदारेश्वर मंदिर का उल्लेख स्कंद पुराण के काशी खंड में मिलता है। प्राचीन मान्यताओं में इसका नाम ‘काशी केदार’ बताया गया है। कालांतर में शिवलिंग के दो भागों में विभक्त स्वरूप के कारण इसे गौरी केदारेश्वर (Varanasi Temple) के नाम से जाना जाने लगा। धार्मिक परंपरा में इसे भगवान शिव और शक्ति के साथ विष्णु और लक्ष्मी के संयुक्त स्वरूप का प्रतीक माना जाता है।
मंदिर के बारे में यह भी मान्यता प्रचलित है कि 17वीं शताब्दी में औरंगजेब के समय काशी के अनेक मंदिरों पर संकट आया, लेकिन गौरी केदारेश्वर मंदिर सुरक्षित रहा। हालांकि इस संबंध में ऐतिहासिक स्रोतों और धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग विवरण मिलते हैं, लेकिन स्थानीय श्रद्धालुओं की आस्था में इस मंदिर का महत्व आज भी उतना ही कायम है।
ऋषि मान्धाता की भक्ति से जुड़ी है खिचड़ी भोग की परंपरा
गौरी केदारेश्वर मंदिर की सबसे अनूठी परंपराओं में भगवान को खिचड़ी का भोग लगाना शामिल है। धार्मिक कथा के अनुसार ऋषि मान्धाता भगवान शिव के परम भक्त थे। वह प्रतिदिन हिमालय जाकर भगवान शिव और माता पार्वती को खिचड़ी का भोग अर्पित करते थे।
एक बार अस्वस्थ होने के कारण ऋषि मान्धाता हिमालय नहीं जा सके। इससे वह अत्यंत दुखी हुए और उन्होंने भगवान शिव से प्रार्थना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव काशी (Varanasi Temple) में गौरी केदारेश्वर स्वरूप में प्रकट हुए। मान्यता है कि भगवान ने स्वयं ऋषि का खिचड़ी का भोग स्वीकार किया। इसके बाद भगवान शिव ने काशी में इसी स्वरूप में निवास करने का संकल्प लिया।
इसी कथा के कारण आज भी गौरी केदारेश्वर में खिचड़ी का भोग विशेष महत्व रखता है। श्रद्धालु बेलपत्र, गंगाजल और दूध अर्पित करने के साथ बाबा को खिचड़ी का भोग लगाते हैं। मान्यता है कि भगवान शिव स्वयं भक्तों (Varanasi Temple) की श्रद्धा से लगाए गए इस भोग को स्वीकार करने आते हैं।
चार युगों में चार स्वरूपों में पूजे जाने की मान्यता
धार्मिक मान्यता के अनुसार गौरी केदारेश्वर के स्वयंभू शिवलिंग का स्वरूप चारों युगों से जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि सतयुग में यह नवरत्नमय, त्रेतायुग में स्वर्णमय, द्वापर में रजतमय और कलियुग में शिलामय स्वरूप में पूजित होगा। वर्तमान में यहां शिलामय स्वयंभू शिवलिंग की पूजा की जाती है।
इस शिवलिंग (Varanasi Temple) को माता अन्नपूर्णा की कृपा से भी जोड़ा जाता है। यही कारण है कि यहां खिचड़ी के भोग को केवल प्रसाद नहीं, बल्कि अन्न और समृद्धि के प्रतीक के रूप में भी देखा जाता है।
सावन में बढ़ जाती है श्रद्धालुओं की भीड़
महादेव को प्रिय सावन मास में गौरी केदारेश्वर मंदिर में विशेष धार्मिक आयोजन होते हैं। सावन के प्रत्येक सोमवार को गंगा अथवा मंदिर के समीप स्थित गौरी कुंड (Varanasi Temple) में स्नान कर भगवान केदारेश्वर का जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक करना अत्यंत पुण्यकारी माना जाता है।
भक्त गंगा जल, दूध, बेलपत्र और अन्य पूजन सामग्री लेकर बाबा के दरबार में पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में ‘हर हर महादेव’ के जयघोष के साथ ‘गौरी केदारेश्वराभ्यां नमः’ का जाप भी सुनाई देता है।
सावन की एक विशेष मान्यता यह भी है कि इस दौरान गंगा का जलस्तर बढ़ने पर मां गंगा बाबा की चौखट तक पहुंचती हैं। इससे मंदिर की धार्मिक आभा और भी बढ़ जाती है।
1932 से चली आ रही जलाभिषेक की परंपरा
गौरी केदारेश्वर मंदिर से जुड़ी एक महत्वपूर्ण परंपरा यादव अथवा चंद्रवंशी समाज से भी जुड़ी है। मान्यता के अनुसार सावन के पहले सोमवार को समाज के लोग यहां से गंगाजल लेकर काशी विश्वनाथ सहित अन्य शिवालयों में जलाभिषेक करते हैं। यह परंपरा वर्ष 1932 से लगातार चली आ रही है।
इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु बाबा (Varanasi Temple) के दर्शन और पूजन के बाद जल लेकर निकलते हैं। काशी की धार्मिक परंपराओं में इस यात्रा का अपना विशेष महत्व माना जाता है।
चार पहर होती है आरती, भोग में आज भी खिचड़ी
गौरी केदारेश्वर मंदिर में पूजन और आरती की परंपरा भी अन्य मंदिरों से कुछ अलग मानी जाती है। यहां प्रतिदिन चार बार आरती होती है। परंपरा के अनुसार मंदिर में ब्राह्मण बिना सिले वस्त्र धारण कर आरती और पूजा-अर्चना करते हैं।
भोर में मंदिर के पट खुलने के बाद मंगला आरती होती है। इसके बाद सुबह करीब 10 बजे से 11 बजे के बीच महानैवेद्य या भोग आरती होती है। दोपहर करीब चार बजे अपराह्न आरती और शाम को प्रदोषकाल में आरती की परंपरा है। रात्रि में शयन आरती के साथ दैनिक पूजन क्रम पूरा होता है।
सावन में आस्था का केंद्र बन जाता है मंदिर
सावन के दौरान काशी के प्रमुख शिवालयों में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है, लेकिन गौरी केदारेश्वर (Varanasi Temple) की अपनी अलग धार्मिक पहचान है। यहां के स्वयंभू शिवलिंग का अद्भुत स्वरूप, शिव-पार्वती और विष्णु-लक्ष्मी की संयुक्त मान्यता, खिचड़ी के भोग की परंपरा और गंगा से जुड़ा धार्मिक संबंध इसे विशेष बनाते हैं।
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मान्यता है कि बाबा गौरी केदारेश्वर के दर्शन मात्र से भक्तों के पापों का क्षय होता है और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। श्रद्धालु घर से मंदिर की ओर निकलने के प्रत्येक कदम को पुण्यकारी मानते हैं। इसी विश्वास के साथ सावन में देश-विदेश से शिवभक्त काशी पहुंचते हैं और केदार घाट (Varanasi Temple) पर बाबा गौरी केदारेश्वर के दरबार में जलाभिषेक कर अपनी मनोकामनाएं अर्पित करते हैं।
