Varanasi: सुप्रीम कोर्ट (SC) ने एक बड़ा आदेश सुनाया है। कैंसर का इलाज सिर्फ बीमारी से लड़ाई नहीं, बल्कि कई परिवारों के लिए आर्थिक तबाही की वजह भी बनता जा रहा है। महंगी दवाओं और इम्यूनोथेरेपी की कीमत के चलते मरीज घर-जमीन और गहने तक बेच रहे हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान दवा की कीमतों में भारी अंतर पर तीखी टिप्पणी करते हुए इसे मरीजों के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ करार दिया।
इलाज का खर्च बना परिवारों पर बोझ
वाराणसी (Varanasi) में कैंसर मरीजों की स्थिति भी इस आर्थिक संकट की तस्वीर सामने रखती है। विशेश्वरगंज निवासी 48 वर्षीय बचाऊ लाल, नाम बदला हुआ, स्तन कैंसर से पीड़ित अपनी पत्नी का इलाज करा रहे हैं। डॉक्टर ने उन्हें इम्यूनोथेरेपी की सलाह दी। एक साइकल का खर्च करीब तीन लाख रुपये बताया गया। परिवार ने इलाज के लिए घर का प्लाट बेच दिया, लेकिन तीन साइकल के बाद ही पैसे खत्म हो गए।
अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा लेने का दबाव
बचाऊ लाल का कहना है कि अस्पताल की फार्मेसी से ही दवा खरीदनी पड़ती है। उनका आरोप है कि बाहर वही दवा सस्ती मिलने की जानकारी होने के बावजूद वहां से खरीदने की अनुमति नहीं दी जाती। ऐसे हालात में इलाज का खर्च परिवार की आर्थिक क्षमता से बाहर चला जाता है।
ओसिमर्टिनिब का खर्च डेढ़ लाख से ज्यादा
पहड़िया के पास रहने वाली 52 वर्षीय रीना देवी, नाम बदला हुआ, फेफड़े के कैंसर से जूझ रही हैं। उनके मुताबिक ओसिमर्टिनिब जैसी दवा का खर्च हर महीने डेढ़ लाख रुपये से अधिक पहुंच रहा है। पति की नौकरी छूट चुकी है और इलाज के लिए गहने तक बेचने पड़ गए हैं। परिवार के पास अब आर्थिक सहारे के नाम पर बहुत कुछ नहीं बचा है।
आयुष्मान कार्ड के बावजूद पूरा खर्च नहीं होता कवर
रीना देवी के मुताबिक परिवार के पास आयुष्मान कार्ड है, लेकिन महंगी दवाओं का पूरा खर्च इससे कवर नहीं हो पाता। ऐसे में इलाज जारी रखने के लिए मरीजों के परिवारों को अपनी बचत, संपत्ति और आभूषण तक बेचने पड़ रहे हैं। वाराणसी (Varanasi) से सामने आए ये मामले उस बड़े सवाल की ओर इशारा करते हैं कि गंभीर बीमारी के इलाज की कीमत आम परिवार की पहुंच में कितनी है।
10 गुना कीमत के अंतर पर सुप्रीम कोर्ट सख्त
22 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने कैंसर की जरूरी दवाओं की कीमतों में भारी अंतर पर गंभीर चिंता जताई। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ के सामने बताया गया कि एक जरूरी कैंसर दवा खुदरा विक्रेता को 2,700 रुपये में मिलती है, जबकि उसकी एमआरपी 27,000 रुपये तक रखी गई है। अदालत ने इस 10 गुना अंतर को मरीजों (Varanasi) के साथ ‘दिनदहाड़े डकैती’ बताया और सवाल उठाया कि 2,700 रुपये में मिलने वाली दवा की एमआरपी 27,000 रुपये कैसे हो सकती है।
अस्पतालों की फार्मेसी पर भी उठे सवाल
सुप्रीम कोर्ट (SC) में दाखिल याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि कुछ निजी अस्पताल मरीजों को बाहर से दवा खरीदने के बजाय अपनी ही फार्मेसी से दवाएं (Varanasi) लेने के लिए मजबूर करते हैं। अदालत ने दवाओं की ऊंची कीमतों और सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत इनके भुगतान से जुड़े असर पर भी सवाल उठाए।
दवाओं की कीमतों पर नियंत्रण के बावजूद चुनौती कायम
राष्ट्रीय औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण यानी एनपीपीए के अनुसार 131 एंटी-कैंसर फॉर्मूलेशन की सीलिंग कीमतें तय की गई हैं। एनपीपीए के अनुसार 2019 में 42 गैर-अनुसूचित एंटी-कैंसर दवाओं पर ट्रेड मार्जिन को 30 प्रतिशत तक सीमित करने की व्यवस्था लागू की गई थी। प्राधिकरण के मुताबिक इससे 526 ब्रांड की एमआरपी में 90 प्रतिशत तक कमी आई और मरीजों (Varanasi) को सालाना करीब 984 करोड़ रुपये की अनुमानित बचत हुई।
फिर भी एमआरपी और वास्तविक कीमत का अंतर सवालों में
एनपीपीए के पास दवाओं (Varanasi) की कीमतों की निगरानी और निर्धारित व्यवस्था के तहत कीमत नियंत्रित करने के अधिकार हैं। 23 जून 2026 तक प्राधिकरण ने 935 फॉर्मूलेशन के सीलिंग प्राइस तय किए थे। इसके बावजूद कैंसर जैसी गंभीर बीमारी में कुछ दवाओं की खरीद कीमत और मरीज से वसूली जाने वाली एमआरपी के बीच बड़ा अंतर सामने आना नियमन और उसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर सवाल खड़े करता है।
महंगी दवाओं की लंबी सूची
कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कई आधुनिक दवाएं (Varanasi) मरीजों के लिए बेहद महंगी पड़ती हैं। उपलब्ध बाजार अनुमान के मुताबिक पेम्ब्रोलिजुमैब की एक डोज या साइकल करीब 2.50 से 4.50 लाख रुपये, निवोलुमैब 1.50 से 3 लाख रुपये और एटेजोलिजुमैब 1.20 से 2.50 लाख रुपये तक पड़ सकता है। ट्रैस्टुजुमैब की एक वायल की कीमत करीब 30 हजार से 70 हजार रुपये और बेवासिजुमैब की एक वायल 70 हजार से 1.50 लाख रुपये तक बताई जाती है।
इसी तरह पर्टुजुमैब की एक वायल करीब 2.50 से 3 लाख रुपये, ओसिमर्टिनिब का मासिक खर्च लगभग 1.20 से 1.60 लाख रुपये, रिबोसिसिलिब का सालाना खर्च करीब 9.50 लाख रुपये, एनहर्टू की एक वायल करीब 1.67 लाख रुपये और इपिलिमुमैब का सालाना खर्च 30 लाख रुपये से अधिक बताया गया है। वास्तविक कीमत (Varanasi) ब्रांड, खुराक, उपचार अवधि और शहर के अनुसार अलग हो सकती है।
वाराणसी में कारोबार का सटीक आंकड़ा जुटाना चुनौती
केमिस्ट एंड ड्रगिस्ट फेडरेशन उत्तर प्रदेश के प्रदेश अध्यक्ष संदीप चतुर्वेदी (Varanasi) के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद बनारस में कैंसर दवाओं के कारोबार को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने बताया कि यहां कैंसर की दवाएं सामान्य मेडिकल दुकानों के बजाय कुछ चुनिंदा मेडिकल स्टोर्स और सीधे अस्पतालों में अधिक मिलती हैं। अलग-अलग कंपनियों और दवाओं की कई वैरायटी होने के कारण वाराणसी में कैंसर दवाओं की कुल खपत का सटीक आंकड़ा जुटाना आसान नहीं है।
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कैंसर के इलाज की बढ़ती लागत का असर सिर्फ अस्पताल के बिल तक सीमित नहीं है। जब परिवार इलाज के लिए प्लाट, घर और गहने बेचने लगें और सरकारी स्वास्थ्य बीमा के बावजूद महंगी दवाओं का पूरा खर्च न उठ पाए, तब मामला (Varanasi) बीमारी से आगे बढ़कर इलाज की आर्थिक पहुंच का बन जाता है। सुप्रीम कोर्ट (SC) की टिप्पणी ने दवा की कीमतों के इसी अंतर को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। अब सवाल यह है कि कैंसर मरीजों के लिए जीवन बचाने वाली दवाएं उनकी सबसे बड़ी आर्थिक मजबूरी कब तक बनी रहेंगी।
