Kashi की विश्वविख्यात गुलाबी मीनाकारी (Pink Meenakari) अब केवल आभूषणों और सजावटी वस्तुओं तक सीमित नहीं रही। इस पारंपरिक कला ने अब शतरंज (चेस सेट) को भी ऐसी शाही पहचान दी है कि इसकी कीमत एक प्रीमियम आईफोन के बराबर पहुंच गई है। वाराणसी के कुशल शिल्पकारों द्वारा तैयार किए जा रहे गुलाबी मीनाकारी के विशेष चेस सेट 25 हजार रुपये से लेकर 1.50 लाख रुपये तक में बिक रहे हैं। इनकी मांग देश के साथ-साथ अमेरिका और यूरोप जैसे देशों में लगातार बढ़ रही है।
गुलाबी मीनाकारी के नेशनल अवार्डी एवं मास्टर आर्टिजन कुंज बिहारी सिंह बताते हैं कि यह केवल एक खेल का साधन नहीं, बल्कि भारतीय हस्तशिल्प और सांस्कृतिक विरासत का अनमोल नमूना है। विदेशी पर्यटक जब Kashi आते हैं तो भगवान विश्वनाथ के दर्शन के साथ-साथ स्थानीय हस्तशिल्प की भी खरीदारी करते हैं। इनमें गुलाबी मीनाकारी से बने चेस सेट सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र बन रहे हैं।
10 से 15 दिन की मेहनत से तैयार होता है एक चेस सेट
कुंज बिहारी सिंह के अनुसार, एक उत्कृष्ट गुणवत्ता वाले गुलाबी मीनाकारी चेस सेट को तैयार करने में लगभग 10 से 15 दिन का समय लगता है। यदि डिजाइन विशेष और अधिक जटिल हो तो इसे बनाने में एक महीने तक का समय लग जाता है। प्रत्येक मोहरे पर बेहद बारीक नक्काशी, हाथ से की गई मीनाकारी और पारंपरिक रंगों का संयोजन इसे एक अनूठी कलाकृति बना देता है।
हर मोहरा होता है हस्तनिर्मित
इस शतरंज के प्रत्येक मोहरे को अलग-अलग तैयार किया जाता है। धातु पर नक्काशी, डिजाइन उकेरना, रंग भरना, फायरिंग और अंतिम पॉलिश जैसी कई जटिल प्रक्रियाओं से गुजरने के बाद एक संपूर्ण चेस सेट तैयार होता है। यही कारण है कि हर सेट अपने आप में अलग और विशेष होता है।
Kashi के शिल्पकार इन चेस सेटों का निर्यात अमेरिका, यूरोप सहित कई देशों में कर रहे हैं। विदेशी खरीदार इन्हें लक्जरी हैंडीक्राफ्ट और कलेक्टर आइटम के रूप में पसंद कर रहे हैं। कई पर्यटक वाराणसी से इन्हें स्मृति चिह्न के रूप में भी खरीदकर ले जाते हैं।
Kashi के कारीगरों को मिल रहा रोजगार
गुलाबी मीनाकारी के बढ़ते बाजार से स्थानीय कारीगरों को भी रोजगार मिल रहा है। इस कला से जुड़े अनेक परिवारों की आजीविका इसी पर निर्भर है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस कला को और अधिक वैश्विक मंच मिले तो काशी की यह पारंपरिक शिल्पकला अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई ऊंचाइयों तक पहुंच सकती है।
गुलाबी मीनाकारी से तैयार यह शतरंज केवल एक खेल नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति, परंपरा और उत्कृष्ट हस्तकला का प्रतीक बन चुका है। इसकी बढ़ती कीमत और अंतरराष्ट्रीय मांग इस बात का प्रमाण है कि सदियों पुरानी Kashi की कला आज भी दुनिया के बाजार में अपनी अलग पहचान बनाए हुए है।



